Real Talent vs. Power : विवेक ओबेरॉय ने बताया क्यों अवॉर्ड्स जीतने के बाद भी घर बैठना पड़ा
News India Live, Digital Desk : क्या आपको 2000 के दशक का वो दौर याद है? उस वक्त एक नया लड़का आया था—विवेक ओबेरॉय (Vivek Oberoi)। फिल्म 'कंपनी' और 'साथिया' में उनकी एक्टिंग देखकर सबको लगा था कि यह लड़का अगला सुपरस्टार बनेगा। लोग उन्हें 'नेक्स्ट शाहरुख खान' तक कहने लगे थे। लेकिन फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि वो स्क्रीन से गायब से हो गए।
सालों की चुप्पी के बाद, अब विवेक ने उस मुश्किल वक्त के पन्ने पलटे हैं और एक कड़वी सच्चाई दुनिया के सामने रखी है। उन्होंने बताया है कि कैसे इंडस्ट्री के 'डर' ने उनके चलते हुए करियर पर ब्रेक लगा दिया था।
वो एक वाक्य: "कौन पंगे लेगा यार?"
विवेक ओबेरॉय ने हाल ही में अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उस वक्त माहौल बहुत अजीब था। उन्होंने 'शूटआउट एट लोखंडवाला' (Shootout at Lokhandwala) जैसी हिट फिल्म दी थी, उनके काम के लिए उन्हें अवॉर्ड्स मिल रहे थे, आलोचक उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन जब बात नई फिल्में मिलने की आती थी, तो सब हाथ पीछे खींच लेते थे।
विवेक बताते हैं कि प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स उनसे मिलते थे, उनके काम की वाहवाही करते थे, लेकिन फिल्म में लेने से कतराते थे। उनके दिमाग में बस एक ही डर था— "यार, कौन पंगे लेगा? (Who wants to take the risk?)"।
यह डर किसी खराब एक्टिंग का नहीं था, बल्कि किसी 'ताकतवर इंसान' से पंगा लेने का था। (हालांकि विवेक ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन हम सब जानते हैं कि वो इशारा किस पुराने विवाद की तरफ कर रहे थे)। इंडस्ट्री के लोगों को लगता था कि अगर उन्होंने विवेक के साथ काम किया, तो वो मुश्किल में पड़ जाएंगे।
काम मांगने नहीं, काम करके दिखाया
विवेक का कहना है कि वो समय उनके लिए मानसिक रूप से बहुत तोड़ने वाला था। सोचिए, एक टैलेंटेड एक्टर, जिसके पास अवॉर्ड्स हैं, लेकिन काम नहीं है, सिर्फ़ लॉबिंग और दबाव की वजह से। उसे अछूत (Pariah) जैसा महसूस कराया गया।
लेकिन, विवेक ने हार नहीं मानी। वो कहते हैं कि उस "दमन" ने उन्हें और मजबूत बना दिया। जब मेनस्ट्रीम फिल्में मिलना बंद हो गईं, तो उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया। उन्होंने वेब सीरीज और ओटीटी की दुनिया में कदम रखा और 'इनसाइड एज' जैसी हिट सीरीज दी।
आज के कलाकारों के लिए सीख
विवेक की यह कहानी आज के नए एक्टर्स के लिए एक बड़ी सीख है। फ़िल्मी दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर से उतनी ही सख्त हो सकती है। लेकिन अगर आपमें हुनर है और आप टिके रहने की जिद्द रखते हैं, तो आपका वक्त ज़रूर आता है—जैसे विवेक का अब फिर से आया है।
वो "कौन पंगे लेगा" का दौर अब बीत चुका है, और विवेक अपने काम से उन सभी को जवाब दे चुके हैं।