तीन दिन के भीतर भारतीय सेना के दो वीर सपूतों छोटूराम और देवेंद्र का पार्थिव शरीर पहुंचा पैतृक गांव

तीन दिन के भीतर भारतीय सेना के दो वीर सपूतों छोटूराम और देवेंद्र का पार्थिव शरीर पहुंचा पैतृक गांव

भारतीय सीमा की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर जवानों की शहादत से जुड़ी एक बेहद गमगीन और झकझोर देने वाली खबर देश के वीर भूमि कहे जाने वाले राजस्थान के शेखावाटी (Shekhawati) अंचल से सामने आई है। राजस्थान का यह प्रतिष्ठित क्षेत्र अपनी बहादुरी और हर परिवार से एक फौजी भेजने की ऐतिहासिक परंपरा के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है, लेकिन पिछले महज तीन दिनों के भीतर इस इलाके ने अपने दो बेहद जांबाज और पराक्रमी बेटों को हमेशा के लिए खो दिया है। देश की सेवा में अपने प्राण न्योछावर करने वाले नायक छोटूराम और वीर जवान देवेंद्र के पार्थिव शरीर जब उनके पैतृक गांवों में पहुंचे, तो वहां का माहौल पूरी तरह से चीख-पुकार और गम में डूब गया। हजारों की संख्या में मौजूद देशवासियों और स्थानीय ग्रामीणों ने भारत माता की जय और अमर शहीद के नारों के साथ अपने इन लाडलों को नम आंखों और पूरे सैन्य तथा राजकीय सम्मान (Military Honours) के साथ अंतिम विदाई दी। आज के इस विस्तृत, भावुक और राष्ट्रीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत आलेख में हम आपको शेखावाटी के इस अमर बलिदान, दोनों वीर सपूतों के सैन्य सफर और उनके अंतिम संस्कार के पूरे घटनाक्रम के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

शेखावाटी की माटी के दो जांबाज सपूत: तीन दिनों के भीतर मिले दोहरे झटके से सहमा पूरा अंचल

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र—जिसमें झुंझुनूं, सीकर और चूरू जैसे जिले शामिल हैं—हमेशा से देश की सेना को सबसे ज्यादा अधिकारी और जवान देने के लिए जाना जाता है। इस माटी का बच्चा-बच्चा देश की रक्षा के लिए सरहद पर सीना तानकर खड़ा होने को अपना सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है। लेकिन पिछले तीन दिनों का यह समय शेखावाटी के इतिहास के सबसे काले और दर्दनाक दौर में से एक बन गया है, जब लगातार अंतराल पर दो अलग-अलग सैन्य छावनियों और ऑपरेशनों से दो वीर जवानों की शहादत की दुखद सूचना उनके घरों तक पहुंची। पहले छोटूराम और उसके ठीक तुरंत बाद जवान देवेंद्र के शहीद होने की खबर ने पूरे इलाके को गहरे सदमे में डाल दिया है। इन दोनों ही वीर सपूतों ने कर्तव्य पथ पर आगे रहते हुए जो अदम्य साहस और बलिदान दिखाया है, उस पर न केवल उनके परिवारों को बल्कि पूरे देश को गर्व है।

तिरंगे में लिपटकर जब घर पहुंचा नायक छोटूराम का पार्थिव शरीर, फफक पड़े परिजन

शहादत के इस सिलसिले में सबसे पहले जब भारतीय सेना के जांबाज जवान छोटूराम का पार्थिव शरीर उनके पैतृक गांव में पहुंचा, तो वहां मौजूद हर एक व्यक्ति की आंखें नम हो गईं। जैसे ही सेना के विशेष वाहन से तिरंगे में लिपटे शहीद का ताबूत नीचे उतारा गया, उनकी माता, पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों की चीख-पुकार से पूरा आसमान गूंज उठा। गांव के युवाओं और बुजुर्गों ने लंबी कतारों में खड़े होकर अपने वीर बेटे पर फूलों की वर्षा की और जब तक सूरज चांद रहेगा, छोटूराम तेरा नाम रहेगा के गगनभेदी नारे लगाए। स्थानीय प्रशासन, सेना के वरिष्ठ अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने मौके पर पहुंचकर शहीद के पार्थिव शरीर पर पुष्प चक्र अर्पित किए और उनकी इस महान शहादत को नमन किया।

वीर जवान देवेंद्र की शहादत ने झकझोरा दिल, नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई

अभी छोटूराम की शहादत का गम लोग भूल भी नहीं पाए थे कि शेखावाटी के ही दूसरे हिस्से से वीर जवान देवेंद्र के सर्वोच्च बलिदान की खबर आ गई, जिसने पूरे इलाके के दिलों को झकझोर कर रख दिया। देवेंद्र अपनी कर्तव्यनिष्ठा और जिंदादिल स्वभाव के लिए अपने यूनिट और गांव में खासे लोकप्रिय थे, और उनके इस तरह अचानक दुनिया से चले जाने पर किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा था। जब उनकी पार्थिव देह उनके गांव लाई गई, तो वहां ऐसा जनसैलाब उमड़ पड़ा कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची। हर कोई अपने इस वीर सपूत की एक झलक पाने और उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए बेताब दिखाई दे रहा था। नम आंखों और गमगीन माहौल के बीच पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी गई, जहां सेना के जवानों ने हवा में गोलियां दागकर अपने साथी को अंतिम सलामी दी।

देश की रक्षा में शेखावाटी के बलिदानों का इतिहास और अमर रहेगा इन वीरों का नाम

शेखावाटी की यह माटी सदियों से यह सिखाती आई है कि देश की हिफाजत से बढ़कर दुनिया में कोई दूसरा धर्म या कर्तव्य नहीं हो सकता है। यहां के हर घर से कोई न कोई सैनिक देश की सीमाओं पर तैनात रहकर दुश्मनों के छक्के छुड़ा रहा है, और जरूरत पड़ने पर अपने प्राणों की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हटता। छोटूराम और देवेंद्र जैसे वीर सपूतों का यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के दिलों में हमेशा देशभक्ति की अलख जगाता रहेगा। सरकार और स्थानीय प्रशासन ने भी शहीद परिवारों को हरसंभव सहायता और सम्मान देने का आश्वासन दिया है, ताकि इन परिवारों के संघर्ष में पूरा देश उनके साथ खड़ा महसूस कर सके। हालांकि किसी भी मुआवजे या सम्मान से एक मां ने अपना बेटा और एक पत्नी ने अपना सुहाग नहीं लौटाया जा सकता, लेकिन इन वीरों की शहादत पर देश का सिर हमेशा गर्व से ऊंचा रहेगा।