एक गांव की 3 बेटियां बनीं सरपंच, पंचायत में नई उम्मीद

एक गांव की 3 बेटियां बनीं सरपंच, पंचायत में नई उम्मीद

हरियाणा और राजस्थान की सीमा से सटे देहाती अंचलों में जमीनी लोकतंत्र का एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक नजारा देखने को मिला है। पंचायती राज व्यवस्था के हालिया नतीजों में एक ही गांव की अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से आने वाली तीन होनहार बेटियों—पूजा, मनीषा और सुनीता ने अलग-अलग पंचायतों में सरपंच पद का चुनाव जीतकर इतिहास रच दिया है। एक ही गांव से संबंध रखने वाली तीन दलित बेटियों का एक साथ ग्राम प्रधान के पद पर परचम लहराना न केवल उनके गांव के लिए गौरव का क्षण है, बल्कि यह बदलते सामाजिक ताने-बाने, महिला सशक्तिकरण और वंचित वर्गों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी की एक मिसाल बन गया है। इस जीत के बाद से पूरे क्षेत्र में तीनों नवनिर्वाचित महिला सरपंचों की खूब चर्चा हो रही है, वहीं अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि उच्च शिक्षित ये बेटियां अपने-अपने गांवों की तस्वीर बदलने में कितनी सफल हो पाएंगी।

संघर्षों से निकलकर पंचायत की कमान तक: जानें तीनों महिला सरपंचों की प्रेरक कहानी

इस ऐतिहासिक जीत का सबसे मजबूत पहलू इन तीनों बेटियों का शिक्षित और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना है। नवनिर्वाचित सरपंचों में शामिल पूजा ने उच्च शिक्षा हासिल की है और वे गांव के सामाजिक मुद्दों पर हमेशा मुखर रही हैं। वहीं, मनीषा और सुनीता ने भी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी पढ़ाई पूरी की और पंचायती राज में महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी के अधिकार का भरपूर इस्तेमाल किया। चुनाव प्रचार के दौरान पारंपरिक पुरुष प्रधान सोच और पुरानी सामाजिक वर्जनाओं का सामना करने के बावजूद तीनों बेटियों ने डोर-टू-डोर संपर्क साधा और ग्रामीणों को अपने विकास के विजन से प्रभावित किया। दलित पृष्ठभूमि और साधारण परिवारों से ताल्लुक रखने वाली इन बेटियों की इस उपलब्धि ने साबित कर दिया है कि अगर मौका मिले, तो भारत के ग्रामीण इलाकों की महिलाएं किसी भी स्तर पर नेतृत्व कर सकती हैं।

विकास, शिक्षा और महिला सुरक्षा रहेगी पहली प्राथमिकता: क्या बदल पाएंगी पंचायतों की तस्वीर?

जीत की घोषणा के बाद पूजा, मनीषा और सुनीता ने मीडिया से बात करते हुए अपनी प्राथमिकताएं साफ कर दी हैं। तीनों महिला सरपंचों ने स्पष्ट किया है कि वे केवल कागजी या नाममात्र की सरपंच नहीं बनेंगी, बल्कि पंचायत की हर बैठक और फैसले में अपनी स्वतंत्र भूमिका निभाएंगी। उनकी मुख्य प्राथमिकताओं में निम्नलिखित कार्य शामिल हैं:

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्कूल: गांव के सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं सुधारना और बेटियों की पढ़ाई बीच में न छूटे, इसके लिए काम करना।

  • महिला सुरक्षा और स्वास्थ्य: पंचायतों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को दुरुस्त करना, शुद्ध पेयजल व्यवस्था और महिलाओं के लिए अलग सामुदायिक शौचालयों का निर्माण।

  • पारदर्शी सरकारी योजनाएं: मनरेगा, पीएम आवास योजना और वृद्धावस्था पेंशन जैसी जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भ्रष्टाचार के पात्र ग्रामीणों तक पहुंचाना।

  • नशा मुक्ति अभियान: ग्रामीण अंचलों में युवाओं को नशे की लत से दूर रखने के लिए खेल मैदानों का विकास और जागरूकता अभियान चलाना।

'पति या पुरुष रिश्तेदार नहीं, खुद चलाएंगी पंचायत': 'सरपंच पति' संस्कृति को सीधी चुनौती

भारतीय पंचायती राज व्यवस्था में अक्सर 'सरपंच पति' (महिलाओं की जगह उनके पतियों या पुरुषों द्वारा पंचायत चलाना) की प्रथा को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन पूजा, मनीषा और सुनीता की इस हैट्रिक जीत ने इस घिसी-पिटी व्यवस्था को सीधी चुनौती दी है। उच्च शिक्षित होने के कारण ये तीनों बेटियां प्रशासनिक प्रक्रियाओं, कानूनी अधिकारों और पंचायत फंड के उपयोग की पूरी जानकारी रखती हैं। ग्रामीणों का भी मानना है कि नई उम्र की इन पढ़े-लिखे जनप्रतिनिधियों के आने से गांवों में सालों से चली आ रही गुटबाजी, भ्रष्टाचार और विकास कार्यों में शिथिलता समाप्त होगी। अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन के सहयोग से ये तीनों बेटियां अपने-अपने गांवों में किस प्रकार विकास के नए आयाम स्थापित करती हैं।