रामायण में 24 कैरेट गोल्ड से बना था रावण का सिंहासन': शूर्पणखा के रथ पर खर्च हुए थे 1.5 करोड़
भारतीय संस्कृति, सनातन इतिहास और महाकाव्य 'रामायण' (Ramayana) के पन्ने जब भी पलटे जाते हैं, तो उसमें वर्णित भव्यता, वास्तुकला और तकनीकी चमत्कार हर किसी को अचंभित कर देते हैं। रामानंद सागर की पौराणिक रामायण हो या महाकाव्य के प्राचीन ग्रंथ, लंकापति रावण की स्वर्ण नगरी (लंका) की चकाचौंध और वहां की वैभवशाली व्यवस्था का जिक्र हर जगह प्रमुखता से मिलता है। क्या आप जानते हैं कि लंका के राजा रावण का दरबार कितना आलीशान था और उसके सिंहासन से लेकर रथ तक को तैयार करने में किस स्तर की कारीगरी का इस्तेमाल किया गया था? आधुनिक तकनीक और जनरेटिव सर्च के दौर में आज भी लोग रामायण काल की उन अद्भुत रचनाओं के बारे में जानना चाहते हैं जो अपनी भव्यता में आज के आधुनिक महलों को भी मात देती हैं। आइए आज हम आपको रामायण से जुड़े कुछ ऐसे ही रोचक, अनसुने और हैरान करने वाले तथ्यों से रूबरू कराते हैं, जिन्हें जानकर आप भी दांतों तले उंगली दबा लेंगे।
24 कैरेट शुद्ध सोने से बना था रावण का सिंहासन, सोने की ईंटों से जड़ा था पूरा दरबार
महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण और विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण की सोने की लंका केवल एक कहावत नहीं थी, बल्कि वहां कंचन (स्वर्ण) का ऐसा साम्राज्य था जिसकी कल्पना करना भी आज के समय में मुश्किल है। रावण का मुख्य दरबार जिस पर वह बैठता था, वह पूरी तरह से 24 कैरेट शुद्ध सोने (24 Carat Gold) से निर्मित था। उस सिंहासन में बेशकीमती हीरे, माणिक, पन्ना, नीलम और मोतियों की ऐसी बेहतरीन जड़ाई की गई थी कि जब राज दरबार की रोशनी उस पर पड़ती थी, तो पूरा कक्ष जगमगा उठता था। रावण अपनी शक्ति और अहंकार के प्रतीक के रूप में उस स्वर्ण सिंहासन का उपयोग करता था। इसके अलावा, लंका के महल के खंभे, दीवारें और दरवाजे भी सोने की परतों और सोने की ईंटों से सजाए गए थे, जो उसकी अथाह संपत्ति और वास्तुकला के चरम को दर्शाते थे।
शूर्पणखा के रथ में खर्च हुए थे डेढ़ करोड़ रुपये, वास्तुकला और बनावट थी बेहद नायाब
रामायण में रावण की बहन शूर्पणखा के चरित्र और उसके यात्रा वृत्तांत का भी बड़ा महत्व है। पौराणिक कथाओं के जानकारों और विभिन्न ऐतिहासिक विश्लेषणों के अनुसार, रावण अपनी बहन शूर्पणखा की सुख-सुविधाओं और उसकी शान-शौकत का विशेष ध्यान रखता था। शूर्पणखा के चलने के लिए जो विशेष रथ (Chariot) तैयार करवाया गया था, उसकी भव्यता देखते ही बनती थी। उस दौर के कारीगरों और स्वर्णकारों ने उस रथ को सजाने में अपनी कला की पराकाष्ठा पार कर दी थी। आधुनिक आर्थिक मूल्यों और सोने-चांदी की लागत के हिसाब से आंका जाए, तो उस समय शूर्पणखा के केवल उस एक शाही रथ के निर्माण और साज-सज्जा में आज के मूल्य के अनुसार करीब डेढ़ करोड़ रुपये (1.5 Crore Rupees) से अधिक की लागत आई थी। उस रथ में घोड़ों के साज-सामान से लेकर बैठने के स्थान तक को अत्यंत कलात्मक और आरामदायक बनाया गया था।
पुष्पक विमान का अद्भुत रहस्य: जिसे तैयार करने में लगे थे पूरे 6 साल और विश्वकर्मा ने की थी रचना
लंकापति रावण की शान में सबसे बड़ा मुकुट उसका 'पुष्पक विमान' (Pushpak Vimana) था, जिसे उसने अपने सौतेले भाई कुबेर से बलपूर्वक छीन लिया था। इस विमान की बनावट और तकनीकी क्षमता आधुनिक विज्ञान के भी परे मानी जाती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, इस दिव्य पुष्पक विमान को तैयार करने में देवताओं के मुख्य शिल्पकार भगवान विश्वकर्मा को पूरे 6 साल (6 Years) का लंबा समय लगा था। इस विमान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यह मन की गति से उड़ता था। इसमें बैठने वाले यात्रियों की संख्या के अनुसार इसका आकार अपने आप छोटा या बड़ा हो जाता था। इस विमान में इच्छा के अनुसार वायु की गति को नियंत्रित करने की क्षमता थी और यह कभी भी किसी भी दुर्घटना का शिकार नहीं होता था। भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने रावण के वध के बाद लंका से अयोध्या लौटने के लिए इसी ऐतिहासिक पुष्पक विमान का उपयोग किया था, जिसका वर्णन आज भी श्रद्धा के साथ किया जाता है।