राजस्थान निकाय चुनाव का रिजल्ट खोलेगा शेखावाटी के दिग्गजों की सियासी कुंडली, इन 6 बड़े नेताओं का राजनीतिक वजूद पूरी तरह दांव पर
राजस्थान की राजनीति में स्थानीय निकाय चुनावों का पारा इस समय चरम पर है, और इस सियासी रण में सबसे ज्यादा चर्चा उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमा से लगे शेखावाटी अंचल की हो रही है। सीकर, झुंझुनूं और चूरू जैसे जिलों को समेटने वाले शेखावाटी क्षेत्र में नगर निकाय के इन चुनावों को सिर्फ वार्ड पार्षदों या अध्यक्षों के चुनाव के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि इसे इस क्षेत्र के तमाम दिग्गज और क्षत्रपों की राजनीतिक साख की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा माना जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह से दोनों प्रमुख दलों यानी भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बड़े नेताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, उसने यह साफ कर दिया है कि स्थानीय स्तर के इन परिणामों का दूरगामी असर राज्य की मुख्य राजनीति पर पड़ने वाला है। अंचल के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो चुकी है कि इन चुनाव परिणामों के पिटारे से जो आंकड़े बाहर आएंगे, वे कई कद्दावर नेताओं के राजनीतिक भविष्य की नई इबारत लिखेंगे या फिर उनकी मौजूदा सियासी पकड़ को तगड़ा झटका देंगे।
#शेखावाटी की राजनीति में क्यों इतनी अहम हो गई है निकाय चुनावों की यह जंग
राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र हमेशा से अपनी आक्रामक राजनीति, वैचारिक प्रतिबद्धता और कड़े चुनावी मुकाबलों के लिए पूरे प्रदेश में मशहूर रहा है। यहाँ का मतदाता किस करवट बैठेगा, इसका अनुमान लगाना बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों के लिए भी आसान नहीं होता है। वर्तमान निकाय चुनावों में स्थिति यह बन चुकी है कि सत्ताधारी दल से लेकर विपक्षी खेमे तक के तमाम स्थानीय और प्रांतीय स्तर के नेता अपनी प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर मैदान में डटे हुए हैं। ग्रामीण और शहरी इलाकों के मिलन बिंदु वाले इन स्थानीय चुनावों में टिकट वितरण से लेकर भीतरघात तक के मामलों ने माहौल को और अधिक रोमांचक बना दिया है। यही वजह है कि शेखावाटी के इन परिणामों को भविष्य के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के सेमीफाइनल के रूप में देखा जा रहा है, जहां हार या जीत का अंतर भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करेगा।
#इन 6 बड़े नेताओं की सियासी प्रतिष्ठा और भविष्य निकाय परिणामों पर टिका
इस पूरे चुनावी समर में जिन छह प्रमुख राजनेताओं की राजनीतिक कुंडली इन परिणामों पर टिकी हुई है, उनमें अंचल के दोनों दलों के कई दिग्गज शामिल हैं। इन नेताओं के लिए यह चुनाव केवल स्थानीय निकायों में बोर्ड बनाने भर की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह साबित करने का जरिया है कि उनके अपने गृह क्षेत्रों और विधानसभा क्षेत्रों में आज भी उनकी बात का कितना वजन है। यदि उनके समर्थित उम्मीदवार इन चुनावों में जीत दर्ज करने में सफल होते हैं, तो पार्टी के भीतर उनका कद और अधिक मजबूत होगा, और वे आने वाले समय में अपनी शर्तों पर राजनीति कर सकेंगे। इसके विपरीत, यदि परिणाम उनके पक्ष में नहीं आते हैं, तो विरोधी खेमे को उन्हें घेरने और उनकी पकड़ कमजोर होने का खुला मौका मिल जाएगा, जिससे उनके राजनीतिक वर्चस्व को तगड़ा धक्का लग सकता है।
#कार्यकर्ताओं की नाराजगी और भीतरघात ने बढ़ाई दिग्गजों की धड़कनें
निकाय चुनावों की यह सबसे बड़ी विडंबना होती है कि यहाँ टिकटों के बंटवारे से ज्यादा बगावत और अपनों के बीच का मुकाबला खेल बिगाड़ देता है। शेखावाटी के विभिन्न नगर निकायों में इस बार जिस तरह से पार्टी से टिकट न मिलने पर नेताओं के करीबियों, रिश्तेदारों और बागी प्रत्याशियों ने ताल ठोक दी है, उसने इन छह दिग्गजों की नींद उड़ा रखी है। कहीं पिता-पुत्र तो कहीं पति-पत्नी और करीबी रिश्तेदार आमने-सामने खड़े होकर मुकाबला को त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना रहे हैं। ऐसे में इन बड़े नेताओं के लिए अपने ही पाले के असंतुष्टों को मनाना और पार्टी के पक्ष में मतदान करवाना सबसे बड़ी चुनौती साबित हुआ है। मतदान के बाद अब हर किसी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इन अंदरूनी कलह और बगावत के बीच कौन सा नेता अपनी रणनीति के दम पर बाजी मारने में कामयाब रहता है और किसका सियासी तिलिस्म इन चुनावों में ढह जाता है।