पंचायती राज चुनावों में पराक्रम सिंह और कनिका सिंह का एक साथ पर्चा दाखिला
राजस्थान की जमीनी राजनीति और मरुधरा के सियासी हलकों में इन दिनों एक बड़े परिवार की चुनावी एंट्री सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कद्दावर नेता, पूर्व मंत्री और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ के बेटे पराक्रम सिंह राठौड़ और उनकी बहू कनिका सिंह राठौड़ ने एक साथ चुनावी राजनीति में कदम रख दिया है। चूरू जिले में पंचायती राज और जिला परिषद चुनावों के तहत दोनों पति-पत्नी ने बीजेपी प्रत्याशी के रूप में अपना-अपना नामांकन पत्र दाखिल किया है।
जहां पराक्रम सिंह राठौड़ ने जिला परिषद के वार्ड नंबर 39 से ताल ठोकी है, वहीं जयपुर के प्रतिष्ठित महारानी कॉलेज से ग्रेजुएट उनकी पत्नी कनिका सिंह राठौड़ ने वार्ड नंबर 23 से बीजेपी उम्मीदवार के रूप में नामांकन भरा है। एक ही परिवार से पति-पत्नी का एक साथ जिला परिषद के चुनावी समर में उतरना और गांव की सरकार (पंचायती राज) के लिए किस्मत आजमाना पूरे राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में एक नया विमर्श खड़ा कर रहा है।
145 करोड़ की अचल संपत्ति और कॉरपोरेट नेटवर्क, लेकिन नहीं है कोई निजी कार
राजेंद्र राठौड़ के पुत्र पराक्रम सिंह राठौड़ का नाम केवल एक बड़े राजनेता के बेटे के रूप में ही नहीं, बल्कि राजस्थान के अग्रणी युवा उद्यमियों में गिना जाता है। चुनावी हलफनामों और वित्तीय रिकॉर्ड्स के मुताबिक, राठौड़ परिवार का कॉरपोरेट जगत, रियल एस्टेट, कंस्ट्रक्शन, माइनिंग, होटल और रेस्तरां बिजनेस में बड़ा दबदबा है। उनके व्यावसायिक उपक्रमों और अचल संपत्तियों का कुल मूल्यांकन लगभग 145 करोड़ रुपये के आसपास आंका जाता है।
लेकिन इस भारी-भरकम संपत्ति के बावजूद जो बात सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रही है, वह यह है कि पराक्रम सिंह और उनकी पत्नी के पास लग्जरी लाइफस्टाइल का जरिया माने जाने वाले निजी वाहनों (Cars) के नाम पर शून्य का आंकड़ा है। हलफनामे में निजी चार पहिया वाहनों का जिक्र न होना और करोड़पति दंपत्ति का सादगी के साथ गांव-गांव जाकर मतदाताओं से वोट मांगना स्थानीय लोगों के बीच खासा कौतूहल पैदा कर रहा है।
'कड़ी से कड़ी जोड़ना लक्ष्य': ससुर के 40 साल के रसूख का कितना मिलेगा फायदा?
पहली बार सीधे चुनावी मैदान में उतरीं कनिका सिंह राठौड़ ने मीडिया से बातचीत में बेहद साफगोई से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उनके ससुर राजेंद्र राठौड़ पिछले चार दशकों से राजस्थान और चूरू की सेवा कर रहे हैं और जनता के हर सुख-दुख में उनके साथ खड़े रहे हैं। इस पारिवारिक रसूख और जनसेवा की विरासत का फायदा उन्हें जनता के बीच जरूर मिलेगा।
वहीं उनके पति पराक्रम सिंह राठौड़, जो इससे पहले अपने पिता का चुनावी मैनेजमेंट और रणनीतिक काम संभालते आए हैं, उन्होंने अपना चुनावी विजन साझा किया। पराक्रम का कहना है कि केंद्र और राज्य में पहले से ही बीजेपी की मजबूत सरकारें हैं। अब उनका मुख्य उद्देश्य गांव और ब्लॉक स्तर पर भी 'कड़ी से कड़ी जोड़ना' (Double Engine System) है ताकि ग्रामीण बुनियादी ढांचे, सड़कों और पेयजल परियोजनाओं को तेजी से धरातल पर उतारा जा सके।
वंशवाद के आरोप बनाम बीजेपी की जिला परिषद घेराबंदी रणनीति
चूरू और शेखावाटी अंचल में बीजेपी द्वारा एक ही राजनीतिक परिवार के दो सदस्यों को एक साथ जिला परिषद का टिकट दिए जाने पर विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने तीखा हमला बोला है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बीजेपी जो राष्ट्रीय स्तर पर 'परिवारवाद' का विरोध करती है, वह राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों में अपने ही वरिष्ठ नेताओं के बेटों और बहुओं को रेवाड़ी की तरह टिकट बांट रही है।
दूसरी ओर, बीजेपी के रणनीतिकारों का मानना है कि चूरू जिला प्रमुख का पद हासिल करने के लिए पराक्रम सिंह और कनिका सिंह की उम्मीदवारी बेहद मजबूत और जिताऊ समीकरण पेश करती है। आगामी चरण के मतदान में यदि दोनों अपनी-अपनी सीटों से निर्णायक जीत दर्ज करते हैं, तो चूरू जिला परिषद पर बीजेपी का कब्जा लगभग तय माना जा रहा है।
मरुधरा की भावी राजनीति पर इस एंट्री का दूरगामी असर
राजेंद्र राठौड़ राजस्थान बीजेपी के उन गिने-चुने क्षत्रपों में से हैं, जिनकी पकड़ पूरे राजपूत समुदाय और शेखावाटी की ग्रामीण जनता पर बेहद मजबूत रही है। उनके बेटे पराक्रम और बहू कनिका की यह एंट्री केवल एक पंचायत चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे राज्य की भावी विधानसभा और संसदीय राजनीति में राठौड़ परिवार की अगली पीढ़ी की री-लॉन्चिंग और राजनीतिक विरासत की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।
चूरू के चार चरणों में होने वाले इन चुनावों के नतीजे यह तय करेंगे कि चूरू की जनता इस नए युवा और शिक्षित चेहरे को गांव की सरकार की बागडोर सौंपने में कितना भरोसा दिखाती है।