जयपुर नगर निगम चुनाव 2026: पुनीत कर्णावत की बगावत के आगे झुके कालीचरण सराफ? मान ली अपनी गलती
गुलाबी नगरी जयपुर की सियासत में इन दिनों नगर निगम चुनावों को लेकर पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख नजदीक आ रही है, राजनीतिक दलों के भीतर टिकट बंटवारे को लेकर शुरू हुआ घमासान अब खुली बगावत का रूप लेता जा रहा है। इसी बीच भारतीय जनता पार्टी के खेमे से एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। जयपुर के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री कालीचरण सराफ को पार्टी के कद्दावर बागी नेता पुनीत कर्णावत की बगावत के आगे आखिरकार झुकना पड़ गया है। इतना ही नहीं, सियासी दबाव और अंदरखाने चल रहे घटनाक्रम के बीच यह भी सामने आया है कि किस तरह से नेताओं को अपनी गलतियों का अहसास हुआ और इस हाई-वोल्टेज ड्रामे ने स्थानीय चुनाव के समीकरणों को पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है।
जयपुर नगर निगम चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर गरमाया माहौल
जयपुर नगर निगम चुनाव 2026 के लिए जब से बीजेपी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की सूचियां जारी की हैं, तब से पार्टी कार्यालयों के बाहर विरोध प्रदर्शन और नाराजगी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों ही प्रमुख दलों ने एंटी-इंकम्बेंसी से बचने के लिए इस बार कई नए और युवा चेहरों पर दांव खेला है, जिसके चलते कई पुराने, अनुभवी और जमीनी स्तर पर मजबूत माने जाने वाले पार्षदों और कार्यकर्ताओं के टिकट काट दिए गए हैं। टिकट कटने से उपजा यह असंतोष धीरे-धीरे बगावत की आग में बदलने लगा। पार्टी के कई वफादार सिपाही अब निर्दलीय मैदान में उतरने का मन बना चुके हैं, जिससे पार्टी के आधिकारिक प्रत्याशियों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं। इसी सियासी उथल-पुथल के बीच मालवीय नगर और आसपास के इलाकों में पुनीत कर्णावत का मामला सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बन गया है।
पुनीत कर्णावत की बगावत और पार्टी पर बना भारी दबाव
पुनीत कर्णावत भारतीय जनता पार्टी के एक बेहद जाने-माने और सक्रिय नेता हैं, जिनका संगठन में लंबा अनुभव और स्थानीय क्षेत्र में मजबूत जनाधार माना जाता है। जब इस बार के निगम चुनाव में उनके समर्थक या उनके खुद के राजनीतिक भविष्य को लेकर टिकट वितरण में पेंच फंसा, तो उनका गुस्सा खुलकर सामने आ गया। पुनीत कर्णावत और उनके समर्थकों ने जिस तेवर के साथ बगावत का बिगुल फूंका, उससे स्थानीय नेतृत्व के माथे पर बल पड़ गए। स्थानीय चुनाव वार्ड स्तर पर लड़े जाते हैं जहाँ एक-एक वोट और एक-एक मजबूत कार्यकर्ता की कीमत बहुत ज्यादा होती है। बगावत की इस आंधी को भांपते हुए पार्टी के रणनीतिकारों को यह अच्छी तरह समझ आ गया कि यदि इस असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया, तो इसका सीधा नुकसान चुनावी परिणाम पर पड़ेगा।
क्या वाकई कालीचरण सराफ को झुकना पड़ा और माननी पड़ी गलती?
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान जयपुर की राजनीति में यह बात आग की तरह फैल गई कि पार्टी के वरिष्ठ विधायक और कद्दावर नेता कालीचरण सराफ को पुनीत कर्णावत के तीखे तेवरों और बगावती तेवर के आगे झुकना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर समन्वय बिठाने और भीतरघात के खतरे को टालने के लिए बड़े नेताओं को कई बार अपने फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ता है। चर्चा यह भी है कि बंद कमरे की बैठकों और बढ़ते सियासी दबाव के बीच नेताओं को अपनी रणनीति की कमियों का अहसास हुआ और डैमेज कंट्रोल करने की कोशिशें शुरू हुईं। हालांकि, राजनीति की इस बिसात पर कौन कितना झुका और किसने क्या रणनीति अपनाई, यह आने वाले चुनाव परिणामों और डैमेज कंट्रोल की सफलता पर ही पूरी तरह से साफ हो पाएगा।
बागी और निर्दलीय बिगाड़ सकते हैं दोनों पार्टियों का खेल
जयपुर नगर निगम चुनाव के इस पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि इस बार का मुकाबला केवल पार्टी के सिंबल पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव और स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जा रहा है। बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों के सामने इस वक्त सबसे बड़ी चुनौती अपने ही बागियों को मनाने और उन्हें शांत करने की है। यदि बागी उम्मीदवार मैदान में डटे रहते हैं, तो वह आधिकारिक प्रत्याशियों के वोटों में भारी सेंधमारी करेंगे, जिससे जीत का गणित पूरी तरह बिगड़ सकता है। जनता भी अब भली-भांति समझ चुकी है कि टिकट वितरण में हुई खींचतान और आंतरिक कलह का असर शहर के विकास कार्यों पर पड़ सकता है। देखना यह होगा कि इस राजनीतिक ड्रामे के बाद मतदाता किसके सिर पर ताज सजाते हैं और कौन बाजी मारता है।