कांटे के मुकाबले में कांग्रेस को दी मात, प्रसन्नचंद मेहता बने नए मेयर

कांटे के मुकाबले में कांग्रेस को दी मात, प्रसन्नचंद मेहता बने नए मेयर

राजस्थान की राजनीति के सबसे ताकतवर और हाई-प्रोफाइल केंद्रों में से एक जोधपुर से एक बहुत बड़ी और सियासी हलचल मचाने वाली खबर सामने आई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृह जिले और पारंपरिक सियासी गढ़ माने जाने वाले जोधपुर में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इतिहास रचते हुए नगर निगम के मेयर चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज की है। बेहद ही रोमांचक, धड़कनें रोक देने वाले और नजदीकी मुकाबले में बीजेपी के प्रत्याशी प्रसन्नचंद मेहता (Prasannachand Mehta) ने कांग्रेस के उम्मीदवार को करारी शिकस्त देकर जोधपुर के नए मेयर की कुर्सी पर अपना कब्जा जमा लिया है। राजस्थान के इस बड़े राजनीतिक उलटफेर ने न केवल कांग्रेस खेमे में निराशा की लहर पैदा कर दी है, बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया है। अशोक गहलोत के राजनीतिक रसूख वाले इलाके में बीजेपी द्वारा यह बड़ी जीत हासिल करना कोई मामूली बात नहीं है। स्थानीय निकाय के इस चुनाव में अंतिम क्षण तक चले राजनीतिक शह और मात के खेल में जिस तरह बीजेपी ने निर्दलीय पार्षदों और असंतुष्टों को अपने पाले में करके बहुमत का आंकड़ा हासिल किया, उसकी चर्चा अब पूरे राजस्थान के सियासी गलियारों में बहुत तेजी से हो रही है। आइए विस्तार से जानते हैं कि गहलोत के इस मजबूत गढ़ में बीजेपी ने कैसे अपनी जीत का परचम फहराया, वोटों का पूरा समीकरण क्या रहा और इस जीत के मुख्य नायक प्रसन्नचंद मेहता कौन हैं।

जोधपुर नगर निगम के इस महत्वपूर्ण चुनाव को शुरू से ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना रखा था। एक तरफ जहां कांग्रेस पार्टी के सामने अपने शीर्ष नेता अशोक गहलोत के गृह क्षेत्र में साख बचाने की बहुत बड़ी चुनौती थी, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी इस गढ़ में सेंध लगाकर पूरे प्रदेश में एक मजबूत राजनीतिक संदेश देना चाहती थी। मतदान के दिन से लेकर मतगणना के अंतिम राउंड तक मुकाबला इतना कड़ा था कि किसी भी पल पासा पलटने की पूरी गुंजाइश बनी हुई थी। लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ रणनीतिकारों और स्थानीय नेताओं ने पर्दे के पीछे से जिस अचूक रणनीति पर काम किया, उसने अंतिम समय में कांग्रेस के सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया। इस ऐतिहासिक जीत के बाद जोधपुर शहर में बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ढोल-नगाड़ों और आतिशबाजी के साथ जश्न मनाना शुरू कर दिया है, जबकि कांग्रेस पार्टी इस अप्रत्याशित हार के कारणों का विश्लेषण करने में जुट गई है।

गहलोत के सियासी गढ़ जोधपुर में बीजेपी का बड़ा सेंध: कैसे हुआ यह करिश्मा?

जोधपुर को दशकों से कांग्रेस पार्टी और विशेष रूप से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का एक अभेद्य किला माना जाता रहा है। ऐसे में यहां बीजेपी की जीत केवल एक मेयर पद का चुनाव जीतना नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक संदेश है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अंदरूनी असंतोष और पार्षदों के बीच तालमेल की कमी का पूरा फायदा बीजेपी ने उठाया। चुनाव की घोषणा होने के बाद से ही बीजेपी ने अपने सभी पार्षदों की बाड़ेबंदी बहुत ही मुस्तैदी से की थी और साथ ही निर्दलीय जीतकर आए पार्षदों से लगातार संपर्क बनाए रखा। जब वोटिंग का समय आया, तो बीजेपी की संगठनात्मक रणनीति इतनी सटीक बैठी कि कांग्रेस अपने ही संभावित वोट बैंक को एकजुट रखने में नाकाम रही। प्रसन्नचंद मेहता की सर्वस्वीकार्य छवि और स्थानीय स्तर पर उनकी मजबूत पकड़ ने भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभाई, जिससे कुछ ऐसे पार्षदों के वोट भी बीजेपी के पक्ष में आ गए जिनकी उम्मीद कांग्रेस को बिल्कुल नहीं थी।

जानिए वोटों का पूरा सियासी गणित और प्रसन्नचंद मेहता की जीत के मुख्य कारण

जोधपुर मेयर पद के इस चुनाव में जीत और हार का अंतर बेहद कम रहा, जिसने हर किसी की सांसें थाम रखी थीं। अगर आंकड़ों के गणित पर नजर डालें तो कुल वैध मतों की संख्या में से बीजेपी प्रत्याशी प्रसन्नचंद मेहता को जादुई आंकड़े से अधिक वोट प्राप्त हुए, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी अंतिम समय में कुछ वोटों से पिछड़ गए। इस नजदीकी जीत के पीछे सबसे बड़ा कारण बीजेपी का माइक्रोग्रिड मैनेजमेंट रहा। बीजेपी के प्रदेश नेतृत्व और स्थानीय विधायकों ने मिलकर हर एक पार्षद का व्यक्तिगत फीडबैक लिया था और उनकी स्थानीय समस्याओं के समाधान का भरोसा दिया था। दूसरी ओर, कांग्रेस में प्रत्याशियों के चयन को लेकर अंदरखाने जो असंतोष पनपा था, वह वोटिंग के दौरान क्रास-वोटिंग (Cross-Voting) के रूप में सामने आ गया। प्रसन्नचंद मेहता ने अपनी जीत के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह जीत जोधपुर की जनता, पार्टी के कार्यकर्ताओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के विजन की जीत है। उन्होंने शहर की सफाई व्यवस्था, सड़कों के सुधार और आम जनता की समस्याओं के त्वरित समाधान को अपनी पहली प्राथमिकता बताया है। इस नतीजे से यह साफ हो गया है कि राजस्थान के स्थानीय निकायों में जनता अब नए विकल्प और तेजी से विकास करने वाले चेहरों पर भरोसा जता रही है।