पंजाब के ग्रामीण इलाकों में सीधे-साधे किसानों और गांववालों के साथ हो रहे कथित अमानवीय बर्ताव पर हरसिमरत कौर बादल का बड़ा हमला
उत्तर भारत के कृषि प्रधान राज्य पंजाब की राजनीति इन दिनों एक बार फिर से बेहद गरमाई हुई है, जिसका मुख्य कारण ग्रामीण अंचलों में प्रशासनिक सख्ती और आम जनता के साथ कथित रूप से हो रहा कड़ा सलूक है। शिरोमणि अकाली दल (SAD) की वरिष्ठ नेता और सांसद हरसिमरत कौर बादल ने राज्य की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार पर बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा है कि पंजाब के सीधे-साधे और मेहनतकश गांववालों के साथ ऐसा बर्ताव किया जा रहा है मानो वे अपने ही देश के नागरिक न होकर कोई खतरनाक आतंकवादी हों। हरसिमरत कौर बादल का यह तीखा बयान ऐसे समय में सामने आया है जब राज्य के विभिन्न जिलों में प्रशासनिक नीतियों, पुलिसिया कार्रवाई और विभिन्न विकास प्रोजेक्ट्स या भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दों को लेकर ग्रामीण इलाकों में भारी असंतोष और तनाव का माहौल देखा जा रहा है। उनका यह कहना था कि जिस पंजाब ने देश का पेट भरने के लिए हमेशा अपनी धमक और पसीना बहाया है, उसी राज्य के भोले-भाले किसानों और ग्रामीणों को आज अपनी ही मांगों को रखने के लिए पुलिस के डंडों और प्रशासनिक दमन का सामना करना पड़ रहा है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कतई स्वीकार्य नहीं है। इस बयान के बाद से पंजाब की राजनीति में भूचाल आ गया है और विपक्षी दल सरकार को चौतरफा घेरने की कोशिश में जुट गए हैं।
अकाली दल नेता द्वारा उठाए गए इन गंभीर मामलों के पीछे ग्रामीण जनता का दर्द और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर क्या उठ रहे हैं सवाल?
हरसिमरत कौर बादल ने अपने बयानों में विस्तार से यह समझाने का प्रयास किया कि कैसे पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आम लोग अपनी छोटी-छोटी समस्याओं और बुनियादी अधिकारों के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। जब कभी भी किसान, मजदूर या ग्रामीण अपने हक की आवाज उठाने के लिए शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन या रैलियां निकालते हैं, तो राज्य प्रशासन उन पर बल प्रयोग करने से भी नहीं चूकता है और उन पर ऐसे कड़े प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं जैसे वे कानून व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुके हों। ग्रामीण इलाकों में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बरती जाने वाली इस तानाशाही शैली के कारण आम जनता के मन में सरकार के प्रति भयंकर रोष व्याप्त होता जा रहा है। अकाली दल का यह साफ आरोप है कि मौजूदा सरकार केवल विज्ञापनों और झूठे दावों की राजनीति कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि पंजाब का अन्नदाता आज खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस कर रहा है। जब किसी राज्य के ग्रामीण समाज के साथ इस तरह का भेदभावपूर्ण और दमनकारी व्यवहार किया जाता है, तो इससे न केवल सामाजिक ताना-बाना बिखरता है, बल्कि राज्य की शांति और भाईचारा भी खतरे में पड़ने लगता है।
आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार और उसके प्रवक्ताओं ने हरसिमरत कौर बादल के इन सभी आरोपों पर क्या कड़ा और स्पष्ट जवाब दिया है?
हरसिमरत कौर बादल द्वारा लगाए गए इन गंभीर और तीखे आरोपों के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार और उसके वरिष्ठ प्रवक्ताओं ने भी बिना कोई देर किए बेहद आक्रामक अंदाज में पलटवार किया है। 'आप' नेताओं ने अकाली दल पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि वे अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन और वजूद को बचाने के लिए निराधार और मनगढ़ंत बयानबाजी का सहारा ले रही हैं। सरकार का पक्ष रखते हुए प्रवक्ताओं ने कहा कि पंजाब पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से कानून के दायरे में रहकर निष्पक्ष तरीके से काम कर रहा है और किसी भी सीधे-साधे नागरिक या किसान के साथ कोई ज्यादती नहीं की जा रही है। 'आप' सरकार का यह तर्क है कि पिछले कई दशकों तक पंजाब की सत्ता पर काबिज रहने वाले अकाली दल और अन्य पारंपरिक दलों ने ही राज्य के किसानों और गरीबों का सबसे ज्यादा शोषण किया है, और आज जब मौजूदा सरकार पारदर्शी तरीके से विकास कार्यों को आगे बढ़ा रही है, तो इन्हें जनता की यह तरक्की रास नहीं आ रही है। सरकार ने यह भी दावा किया कि उनके कार्यकाल में किसानों और गांवों के उत्थान के लिए जितनी ऐतिहासिक योजनाएं और वित्तीय सहायता दी गई है, उतनी कभी पहले के दशकों में नहीं दी गई थी, इसलिए विपक्ष के ये आरोप पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित और झूठे हैं।
पंजाब के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में किसानों, गांवों और राजनीतिक दलों के बीच चल रहे इस टकराव के क्या होंगे दूरगामी परिणाम?
पंजाब की राजनीति का इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि जब-जब राज्य के गांवों और किसानों की आवाज को दबाने का प्रयास किया जाता है, तब-तब वहां की आबोहवा में एक बड़ा राजनीतिक बदलाव देखने को मिलता है। हरसिमरत कौर बादल द्वारा उठाया गया यह मुद्दा और आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा किया गया इसका बचाव यह दर्शाता है कि आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति पूरी तरह से ग्रामीण मुद्दों और किसान कल्याण के इर्द-गिर्द ही घूमने वाली है। एक तरफ जहाँ विपक्षी दल सरकार की नाकामियों और पुलिसिया सख्ती को मुद्दा बनाकर जनता के बीच सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं सत्ताधारी दल अपने विकास कार्यों और भ्रष्टाचार मुक्त शासन के दावों के साथ जनता के बीच अपनी पैठ मजबूत करने में लगा हुआ है। इस सियासी जंग के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच पंजाब का आम ग्रामीण खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है या फिर यह केवल राजनीतिक दलों द्वारा खेली जाने वाली सत्ता की शतरंज का एक नया पैंतरा मात्र है। आने वाले समय में राज्य के मतदाताओं को ही यह तय करना होगा कि वे खोखले बयानों और राजनीतिक ड्रामेबाजी के जाल में फंसना चाहते हैं या फिर अपने असली मुद्दों के समाधान के लिए एक परिपक्व और जवाबदेह नेतृत्व को चुनना चाहते हैं।