पंजाब चुनाव से पहले सीएम फेस घोषित नहीं करेगी कांग्रेस, सचिन पायलट के इस ऐलान से चरणजीत चन्नी समर्थकों को झटका

पंजाब चुनाव से पहले सीएम फेस घोषित नहीं करेगी कांग्रेस, सचिन पायलट के इस ऐलान से चरणजीत चन्नी समर्थकों को झटका

आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव से पहले किसी भी चेहरे को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे नहीं किया जाएगा। पार्टी हाईकमान के इस रुख और नवनियुक्त प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के स्पष्ट संदेश के बाद पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों को बड़ा झटका लगा है। चन्नी खेमे के नेता लंबे समय से मांग कर रहे थे कि पूर्व सीएम और दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम पद का आधिकारिक चेहरा घोषित किया जाए ताकि पार्टी पूरी मजबूती के साथ चुनावी मैदान में उतर सके। हालांकि केंद्रीय नेतृत्व ने सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला किया है जिससे अंदरखाने चल रही खींचतान एक बार फिर सतह पर आ गई है।

सचिन पायलट के सामने गुटबाजी और नेतृत्व की बड़ी चुनौती

कांग्रेस पार्टी ने हाल ही में सांगठनिक फेरबदल करते हुए भूपेश बघेल को हटाकर सचिन पायलट को पंजाब कांग्रेस का नया प्रभारी नियुक्त किया है। सचिन पायलट के कंधों पर पंजाब के तमाम बिखरे हुए गुटों को एक मंच पर लाने की बड़ी जिम्मेदारी है। राज्य इकाई में अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों के बीच वर्चस्व की जंग पुरानी है। हालांकि पायलट के आने से शुरुआत में सभी नेताओं ने स्वागत किया था, लेकिन जैसे ही यह साफ हुआ कि पार्टी आलाकमान बिना किसी सीएम फेस के सामूहिक नेतृत्व के फॉर्मूले पर आगे बढ़ेगा, मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिना मुख्यमंत्री चेहरे के चुनाव लड़ने से पार्टी के भीतर असंतोष और बढ़ सकता है जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों को मिल सकता है।

सामूहिक नेतृत्व का फॉर्मूला और स्थानीय समीकरण

कांग्रेस हाईकमान की यह सोची-समझी रणनीति है कि चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने से पार्टी के भीतर गुटबाजी और अधिक आक्रामक हो सकती है। पंजाब की राजनीति में विभिन्न क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों को साधना किसी एक नेता के बस of की बात नहीं रह गई है। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा और प्रदेश अध्यक्ष राजा वडिंग जैसे दिग्गज नेता पहले से ही अपनी दावेदारी मजबूत मानते रहे हैं। ऐसे में सचिन पायलट के सामने सबसे बड़ी चुनौती राहुल गांधी के संभावित दौरों से पहले तमाम नाराज धड़ों को शांत करने और पार्टी कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश देने की है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह सामूहिक नेतृत्व वाला दांव चुनावी वैतरणी पार लगा पाता है या आंतरिक कलह पार्टी की उम्मीदों को कमजोर करती है।