पंजाब में नशे के खिलाफ बीजेपी का महा-अभियान: पीड़ित अभिभावकों को एकजुट कर सरकार पर बोला बड़ा हमला

पंजाब में नशे के खिलाफ बीजेपी का महा-अभियान: पीड़ित अभिभावकों को एकजुट कर सरकार पर बोला बड़ा हमला

भारत के सीमावर्ती राज्य पंजाब में इन दिनों युवाओं की जिंदगी को तबाह कर रहे नशे के अवैध कारोबार और ड्रग्स की समस्या ने एक विकराल रूप धारण कर लिया है, जिसके खिलाफ अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर आर-पार की लड़ाई शुरू हो चुकी है। राज्य के युवाओं को चिट्ठी, हेरोइन और सिंथेटिक ड्रग्स के दलदल से बाहर निकालने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बहुत बड़ा और आक्रामक जन आंदोलन छेड़ने का ऐलान कर दिया है। इसी कड़ी में भाजपा ने उन तमाम पीड़ित अभिभावकों, माताओं और परिवारों को एक मंच पर एकजुट करना शुरू कर दिया है जिन्होंने नशे की इस भयानक लत के कारण अपने जवान बेटों और घरों के चिरागों को खो दिया है। राजधानी चंडीगढ़ से लेकर राज्य के विभिन्न जिलों तक आयोजित की जा रही इन बैठकों और रैलियों में जब वो बेसहारा मां-बाप अपनी आपबीती सुनाते हैं, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो जाती हैं। ड्रग्स के इस अंतहीन खेल के कारण पंजाब का हर दूसरा परिवार अंदर से सुलग रहा है, और अब यही दर्द राजनीतिक और सामाजिक बदलाव की एक बहुत बड़ी चिंगारी बनता जा रहा है।

पंजाब सरकार से तीखे सवाल: ड्रग्स के खात्मे के चुनावी वादों का क्या हुआ?

इस जन आंदोलन के दौरान भाजपा के वरिष्ठ नेताओं और पीड़ित अभिभावकों ने पंजाब की मौजूदा भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी (AAP) प्रशासन से तीखे और सीधे सवाल पूछने शुरू कर दिए हैं। सत्ता में आने से पहले जिन राजनीतिक दलों ने यह बड़े-बड़े दावे और कसमें खाई थीं कि वे सरकार बनते ही कुछ ही हफ्तों में पंजाब से नशे की जड़ें उखाड़ फेंकेगे, आज उनके कार्यकाल में ड्रग्स की सप्लाई लाइन और अधिक मजबूत होती दिख रही है। गलियों और मोहल्लों तक आसानी से मिलने वाली चिट्टा और अन्य नशीली दवाएं आज भी खुलेआम बिक रही हैं, जिससे पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बहुत बड़े सवालिया निशान खड़े होते हैं। पीड़ित माता-पिता का कहना है कि वे दफ्तरों और पुलिस थानों के चक्कर काटकर थक चुके हैं, लेकिन तस्करों पर कड़ी कार्रवाई होने के बजाय उन्हें राजनीतिक संरक्षण मिल जाता है। भाजपा ने सरकार को खुली चुनौती दी है कि यदि वे वाकई पंजाब को 'रंगला पंजाब' बनाना चाहते हैं, तो उन्हें हवा में हवाई दावे करने के बजाय जमीन पर उतरकर ड्रग माफियाओं के खिलाफ ताबड़तोड़ और निर्णायक कार्रवाई करनी होगी।

जमीनी स्तर पर जन आंदोलन की रूपरेखा: घर-घर जाकर युवाओं और महिलाओं को किया जाएगा जागरूक

केवल मंचों से भाषण देने या बयानबाजी करने से इस सामाजिक कोढ़ को खत्म नहीं किया जा सकता, इसी बात को ध्यान में रखते हुए भाजपा ने इस जन आंदोलन को सीधे जमीनी स्तर (Grassroots Level) पर ले जाने का फैसला किया है। पार्टी कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों के सहयोग से हर गांव, हर शहर और हर वार्ड में 'नशा मुक्ति समितियां' बनाई जा रही हैं जो घर-घर जाकर युवाओं और महिलाओं को इसके दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करेंगी। इसके साथ ही, जो युवा इस बुरी लत का शिकार हो चुके हैं, उन्हें चिन्हित करके सरकारी और निजी नशा मुक्ति केंद्रों (Rehabilitation Centres) में उनके इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था कराने में मदद की जाएगी। महिलाओं और माताओं की इस आंदोलन में सबसे आगे होना इस बात का प्रतीक है कि अब पंजाब का परिवार खुद अपनी संतानों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर आया है। जब तक समाज खुद इस बुरामी के खिलाफ खुलकर आवाज नहीं उठाता, तब तक पुलिस या सरकार अकेले दम पर इस राक्षस का अंत नहीं कर सकती, और यही इस जन आंदोलन की सबसे बड़ी और मूल ताकत है।

राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक विफलता: क्यों नहीं रुक पा रहा है बॉर्डर पार से ड्रग्स का आना?

पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है, और यहां पाकिस्तान की तरफ से ड्रोन के जरिए हथियारों के साथ-साथ हेरोइन और ड्रग्स की तस्करी लगातार की जाती रही है। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां (जैसे BSF) और राज्य पुलिस अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर राजनीतिक मिलीभगत और करप्शन के कारण यह काला कारोबार अंदरूनी इलाकों तक आसानी से पहुंच जाता है। भाजपा ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा है कि जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत नहीं होगी और ड्रग्स के इस सिंडिकेट को ऊपर से संरक्षण देने वाले बड़े चेहरों को बेनकाब नहीं किया जाएगा, तब तक पंजाब की युवा पीढ़ी को बचाना असंभव है। विपक्षी दलों और आलोचकों का भी मानना है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय सभी दलों को दलगत भावनाओं से ऊपर उठकर एक साझा रणनीति बनानी चाहिए ताकि इस राज्य की आने वाली पीढ़ियों को पूरी तरह तबाह होने से बचाया जा सके।

पंजाब के अस्तित्व की लड़ाई और इस जन आंदोलन का दूरगामी असर

अंततः, नशे के खिलाफ भाजपा द्वारा शुरू किया गया यह जन आंदोलन और पीड़ित अभिभावकों का यह संघर्ष केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह पंजाब के अस्तित्व और उसकी अस्मिता को बचाने की एक आखिरी लड़ाई जैसा बन गया है। जिस तरह से मां-बाप अपने बच्चों की चिताओं को कंधा देने के बाद अब सड़कों पर इंकार और न्याय की मांग कर रहे हैं, वह किसी भी संवेदनशील सरकार को झकझोर देने के लिए काफी है। अब देखना यह होगा कि पंजाब सरकार इस बढ़ते जन दबाव के बाद नींद से जागती है और ड्रग माफियाओं के खिलाफ कोई ऐतिहासिक कदम उठाती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि जनता अब और चुप बैठने वाली नहीं है।