Punjab Politics : अकाली दल में फिर मचेगी रार? शिरोमणि अकाली दल पुनर्जीवित से अलग हो सकते हैं परमिंदर ढींडसा
News India Live, Digital Desk: पंजाब की सियासत में शिरोमणि अकाली दल (SAD) के भीतर चल रहा अंतर्कलह एक बार फिर चरम पर पहुंचता दिख रहा है। अकाली दल के बागी धड़े 'शिरोमणि अकाली दल (पुनर्जीवित)' में बड़ी फूट पड़ने के संकेत मिल रहे हैं। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींडसा इस नए बने धड़े से भी किनारा कर सकते हैं। उनके इस संभावित कदम ने पंजाब के पंथक और राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।
क्यों नाराज हैं परमिंदर ढींडसा?
जानकारी के अनुसार, शिरोमणि अकाली दल (पुनर्जीवित) के गठन के बाद नेतृत्व के मुद्दों और रणनीतिक फैसलों को लेकर ढींडसा खेमे में असंतोष बढ़ रहा है। हाल ही में हुई कोर कमेटी की बैठकों में उनकी अनुपस्थिति और कुछ खास मुद्दों पर उनकी चुप्पी को 'बगावत' के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों का दावा है कि परमिंदर ढींडसा पार्टी के मौजूदा कामकाज के तरीके और भविष्य की योजनाओं से सहमत नहीं हैं।
एसजीपीसी चुनावों को लेकर तनातनी
मुद्दे की जड़ में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के चुनावों में हो रही देरी और उस पर पार्टी का रुख भी माना जा रहा है। हालांकि, ज्ञानी हरप्रीत सिंह के नेतृत्व वाला यह धड़ा एसजीपीसी चुनावों में देरी के खिलाफ आंदोलन की तैयारी कर रहा है, लेकिन ढींडसा, सुरजीत सिंह रखड़ा और गोबिंद सिंह लौंगोवाल जैसे वरिष्ठ नेताओं को मनाने की कोशिशें अब तक नाकाम रही हैं। अगर ये दिग्गज नेता अलग होते हैं, तो 'अकाली दल (पुनर्जीवित)' को बड़ा झटका लग सकता है।
क्या सुखबीर बादल के साथ फिर होगी सुलह?
सियासी गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि क्या नाराज चल रहे ये नेता एक बार फिर मुख्य शिरोमणि अकाली दल और सुखबीर सिंह बादल के साथ हाथ मिला सकते हैं। हालांकि, ढींडसा परिवार की ओर से अभी तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन उनके करीबियों का मानना है कि वे 'पंथक एकता' के नाम पर कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। हाल ही में ढींडसा ने परशुराम जयंती के मौके पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जहाँ उन्होंने केवल धार्मिक और सामाजिक एकजुटता की बात की।
पंजाब की पंथक राजनीति पर पड़ेगा गहरा असर
परमिंदर ढींडसा का अगला कदम पंजाब की पंथक राजनीति की दिशा तय करेगा। यदि वे अपनी अलग राह चुनते हैं, तो अकाली दल का वोट बैंक और अधिक बिखर सकता है। विपक्ष की नजरें भी इस घटनाक्रम पर टिकी हैं, क्योंकि अकाली दल की कमजोरी का सीधा फायदा अन्य पार्टियों को मिलने की उम्मीद है। फिलहाल, सभी की निगाहें ढींडसा के अगले आधिकारिक बयान पर हैं, जो आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति की नई तस्वीर पेश करेगा।