ऐतिहासिकता को भी प्रमाण चाहने वाला मनोविज्ञान !
कभी आपने देखा कि विवेक अग्निहोत्री या सुदीप्तो सेन या आदित्य धर आदि निर्देशकों को जब फिल्में बनाना होता है तो उसके पूर्व उन्हें इतिहास का बहुत अध्ययन करना पड़ा है, बहुत सी बारीकियों में उतरना पड़ा है पर किसी मुगल-ए-आजम या किसी जोधा अकबर को बनाने के लिए कभी इन परिशुद्धताओं की आवश्यकता नहीं पड़ी।
विवेक या सुदीप्तो या आदित्य से उनसे हर छोटी-छोटी बात के लिए ऐतिहासिक प्रमाण, दस्तावेज, और साक्ष्य मांगे गये। इन फिल्मों की हर घटना, हर संवाद, और हर दृश्य को सूक्ष्मदर्शी यंत्र से परखा गया। विवादों का तूफान खड़ा किया गया, तथ्य-जांचकर्ताओं की पूरी फौज लग गई, और मीडिया में बहसें चलती रहीं।
अग्निहोत्री ने जब 'द कश्मीर फाइल्स' (2022) बनाई, तो उन्होंने लगभग चार वर्षों तक शोध किया। उन्होंने 700 से अधिक कश्मीरी पंडित परिवारों से साक्षात्कार किए, उनके दर्द को समझा, दस्तावेजों का अध्ययन किया, और पुरानी रिपोर्ट्स, समाचार पत्रों और सरकारी अभिलेखों को खंगाला। फिल्म में दिखाए गए अधिकांश दृश्य वास्तविक घटनाओं पर आधारित हैं - जैसे बीके गंजू की हत्या, गिरजा टिक्कू की हत्या, और अन्य भीषण अत्याचार।
इसके बावजूद, फिल्म रिलीज होते ही विवादों में घिर गई। तथाकथित बुद्धिजीवियों, इतिहासकारों, और मीडिया के एक वर्ग ने फिल्म को "प्रोपेगेंडा" करार दिया। हर घटना को चुनौती दी गई, हर आंकड़े पर सवाल उठाए गए। यहां तक कि कश्मीरी पंडितों की पीड़ा को भी "अतिरंजित" बताया गया। विवेक अग्निहोत्री को बार-बार अपनी फिल्म के हर दावे को सिद्ध करना पड़ा, साक्ष्य प्रस्तुत करने पड़े, और जनसुनवाई में खड़ा होना पड़ा।
द बंगाल फाइल्स बंगाल विभाजन (1947) के दौरान हुए नोआखाली नरसंहार और हिंदुओं पर हुए अत्याचारों को दिखाती है। जैसे ही फिल्म की घोषणा हुई या इसके निर्माण की बात आई, तुरंत विवाद शुरू हो गए। फिल्म निर्माताओं से हर घटना के लिए दस्तावेजी सबूत मांगे गए। फिल्म को "सांप्रदायिक एजेंडा" बताया गया। कहा गया कि यह इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रही है। विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूहों ने इसका विरोध किया। निर्माण टीम द्वारा 7000 से अधिक शोध पृष्ठों और 1000 से अधिक अभिलेखों का अध्ययन किया गया। 20,000 से अधिक पृष्ठों के दस्तावेजों और बचे हुए लोगों और उनके परिवारों के साक्षात्कार लिये। 1946 के भारतीय, अंतरराष्ट्रीय, अमेरिकी और ब्रिटिश समाचार पत्रों की गहन जांच की। महीनों विभिन्न शहरों और गांवों का दौरा किया गया। लोगों से साक्षात्कार लिये, स्थानीय संस्कृति और इतिहास का अध्ययन किया, और बंगाल के हिंसक इतिहास के मूल कारण को समझने की कोशिश की।
अग्निहोत्री ने बताया कि जब वे उस समय के समाचार पत्रों की जांच कर रहे थे, तो कुछ छवियों ने उन्हें बहुत बुरी तरह प्रभावित किया। उन्हें यह जानकर भी सदमा लगा कि डायरेक्ट एक्शन डे में लगभग 40,000 लोग केवल दो रातों में मारे गए, और कोलकाता की सड़कों पर एक महीने से अधिक समय तक मानव शव पड़े रहे क्योंकि उन्हें साफ करने के लिए कोई नहीं बचा था, अधिकांश सफाई कर्मचारी मारे जा चुके थे। उनकी टीम को बहुत सारी बाधाओं का सामना करना पड़ा, जिसमें कोलकाता में एक होटल में हिरासत में लिया जाना भी शामिल था।
सुदीप्तो सेन की ‘द केरल स्टोरी’ जो केरल में लव जिहाद और आईएसआईएस में भर्ती की कहानी बताती है, को तुरंत "झूठी" और "भ्रामक" करार दिया गया। आंकड़ों पर विवाद हुआ, और फिल्म निर्माताओं को संख्याओं में संशोधन करना पड़ा। आलोचनाओं से निपटने से कहीं अधिक कठिन था फिल्म बनाने में हुआ विरोध। सुदीप्तो ने शोध के लिए केरल में लगभग 10 वर्षों तक काम किया। यह एक असाधारण लंबी अवधि है जो उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। 2018 में सुदीप्तो ने एक विवादास्पद डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'इन द नेम ऑफ लव - मेलानकॉली ऑफ गॉड्स ओन कंट्री' बनाई थी जो धार्मिक रूपांतरण और लव जिहाद पर थी, जिसे लंदन इंडिपेंडेंट फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार मिला। उन्होंने केरल के हर जिले की यात्रा की, और एक बार उन्हें एक बचकर रहना पड़ा जब उन्हें पता चला कि उनके होटल पर हमला हो सकता है। वास्तविक युवा महिलाओं से मुलाकात की जो धार्मिक रूपांतरण से बच निकली थीं और आर्ष विद्या समाजम आश्रम द्वारा उनकी देखभाल की जा रही थी। सेन ने एक विशेष रूप से मार्मिक घटना साझा की जब उन्होंने पहली बार श्रुति से एक छोटे से गांव में मुलाकात की, तो उसके घर में बिजली नहीं थी क्योंकि कनेक्शन काट दिया गया था। जब भी वह सब्जियां खरीदने बाहर जाती, लोग उसका बैग छीन लेते। सेन को उनसे उनके घर की एक छोटे खिड़की के माध्यम से साक्षात्कार करना पड़ा क्योंकि वे बाहर आने से डरती थीं।
17 मई को मुंबई के रंग शारदा ऑडिटोरियम में 26 साहसी लड़कियों को केरल से विशेष रूप से इस अवसर के लिए बुलाया गया। अभिनेत्री अदा शर्मा ने निर्देशक द्वारा दिखाए गए वीडियो की भयावहता का खुलासा किया जिसमें लड़कियों और उनके बच्चों को टैंकरों में 16 घंटे तक बिना खाने, पीने या खुद को राहत देने के तरीके के बिना कपड़ों के ढेर की तरह जमा किया जा रहा था। जब तक वे अपने गंतव्य पर पहुंचते, कुछ मर चुके होते थे और अधिकांश आधे-मरे हुए होते थे।
उधर, मुगल-ए- आजम को ले लें। इतिहासकारों में आम सहमति है कि अनारकली नाम की कोई दरबारी नर्तकी का कोई विश्वसनीय ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। यह कहानी लोककथाओं और बाद के साहित्य से उत्पन्न हुई प्रतीत होती है। अकबर के समकालीन इतिहासकार अबुल फजल ने 'आइन-ए-अकबरी' में ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं किया।
अकबर के शासनकाल में हुए बनी मुंडों की मीनारें, चित्तौड़ का नरसंहार, और अन्य क्रूर घटनाओं को मुगले आजम में सरासर नजरअंदाज किया गया और दरबारी संस्कृति का रूमानीकरण किया गया। मुगल दरबार को अत्यंत भव्य और सभ्य दिखाया गया, जबकि उस समय की हकीकत कहीं अधिक जटिल और कठोर थी। क्या 'मुगल-ए-आजम' के निर्माताओं से कभी यह पूछा गया कि अनारकली के अस्तित्व का प्रमाण क्या है? क्या उन्हें यह सिद्ध करना पड़ा कि दीवार में चुनवाने की घटना सत्य है? नहीं। फिल्म को "कलात्मक स्वतंत्रता" के नाम पर स्वीकार किया गया और इसे एक क्लासिक बना दिया गया।
जोधा अकबर तो ऐतिहासिक विरूपण का और भी बड़ा उदाहरण है। अकबर की पत्नी का नाम 'जोधा' था या नहीं, यह अत्यंत विवादास्पद है। अधिकांश इतिहासकारों का मानना है कि अकबर की राजपूत पत्नी का नाम 'हरका बाई' या 'हीर कुंवरी' था, जो बाद में 'मरियम-उज-जमानी' कहलाईं। 'जोधा' नाम का कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है। अकबर को एक अत्यंत उदार, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील शासक के रूप में दिखाया गया, जबकि उसके द्वारा किए गए नरसंहारों और क्रूरताओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
फिल्म रिलीज हुई, तो राजस्थान और अन्य राज्यों में राजपूत समुदाय ने इसका विरोध किया। उन्होंने फिल्म को ऐतिहासिक रूप से गलत बताया। लेकिन मीडिया और बुद्धिजीवियों ने इस विरोध को "असहिष्णुता" करार दिया। फिल्म निर्माताओं को अपने दावों को सिद्ध करने की जरूरत नहीं पड़ी। गोलकीपर नेगी को कबीर खान बना देना कलात्मक स्वतंत्रता है तो वह स्वतंत्रता सेलेक्टिव क्यों है?
कभी गौर कीजिए कि इन दिनों गैर-वाम बहुत अध्ययन के साथ काम कर रहा है और वाम अपने चालू जुमलों में अटका पड़ा है।बुद्धिजीविता की तराजू का संतुलन बदल रहा है। आपको शायद यह व्यंग्य लगे कि मैं कहूँ कि आज के युग में शंकराचार्य के ‘ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या’ को सच मानने वाला सिर्फ वाम बुद्धिजीवी है इस फर्क के साथ कि अपने ब्रह्म को वह मार्क्स कहता है। पर जगत् का कार्य व्यापार, उसकी हक़ीक़तें, उसकी सच्चाई इस बुद्धिजीवी के लिए सब मिथ्या हैं।
अब सोचिए, वह कौन-सा मनोविज्ञान है, कौन सी बुद्धिजीविता जिसमें कुछ चीजें अनैतिहासिक होने पर भी स्वतःसिद्ध हैं और वह कौन-सा मनोविज्ञान है जिसमें कुछ चीजें ऐतिहासिक होने पर भी प्रोपेगंडा हैं?