Parenting Alert : दादा दादी और नाना नानी का लाड़ कहीं बच्चे को घमंडी तो नहीं बना रहा? आज ही पहचानें ये लक्षण

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News India Live, Digital Desk : आजकल की पेरेंटिंग पहले के जमाने जैसी नहीं रही। याद कीजिए हमारा बचपन, जब एक खिलौने के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था या फिर पापा की सख्त आवाज़ ही काफी होती थी। लेकिन आज? आज तस्वीर बदल गई है।

अक्सर मॉल में हम देखते हैं कि बच्चा ज़मीन पर लेटकर किसी महंगे खिलौने के लिए रो रहा है, और मां-बाप शर्मिंदगी से बचने के लिए तुरंत वो चीज़ दिला देते हैं। क्या इसे सिर्फ बच्चे का 'हठ' या 'नादानी' कहना सही है? या इसके पीछे कोई बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है?

एक्सपर्ट्स इसे 'सिक्स पॉकेट सिंड्रोम' (Six Pocket Syndrome) का नाम देते हैं। यह शब्द सुनने में नया लग सकता है, लेकिन भारत के 80% शहरों में यह सिंड्रोम अपनी जगह बना चुका है।

आइए, बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं कि यह क्या बला है और यह आपके जिगर के टुकड़े को कैसे नुकसान पहुँचा रहा है।

आखिर क्या है ये 'Six Pocket Syndrome'?

इस गणित को बहुत आसानी से समझिए।
आजकल ज्यादातर परिवार छोटे (Nuclear Family) होते हैं, जिनमें अक्सर एक ही बच्चा होता है। अब इस एक बच्चे पर पैसा खर्च करने वाले छह लोग होते हैं:

  1. माता (Mother)
  2. पिता (Father)
  3. दादा (Paternal Grandfather)
  4. दादी (Paternal Grandmother)
  5. नाना (Maternal Grandfather)
  6. नानी (Maternal Grandmother)

जब इन "6 जेबों" (6 Pockets) का पैसा बिना किसी रोक-टोक के सिर्फ़ एक बच्चे की इच्छा पूरी करने पर खर्च होता है, तो उसे 'सिक्स पॉकेट सिंड्रोम' कहते हैं।

मार्केटिंग कंपनियां इसे एक मौके की तरह देखती हैं, लेकिन माता-पिता के लिए यह चिंता का विषय है। नतीजा यह होता है कि बच्चे के मुंह से मांग निकलने से पहले ही उसकी हसरत पूरी हो जाती है।

इसके लक्षण क्या हैं? (How to Identify)

आप कैसे जानेंगे कि आपका बच्चा इसका शिकार हो रहा है या नहीं? इन संकेतों पर गौर करें:

  1. "ना" सुनने की आदत न होना: अगर आप किसी चीज़ के लिए मना करें और बच्चा तुरंत हिंसक हो जाए, चिल्लाने लगे या खाना छोड़ दे।
  2. कीमत की कद्र न होना: उसे 50 रुपये और 5000 रुपये के खिलौने में फर्क न समझ आना। वह महंगे गिफ्ट्स को भी तोड़-फोड़ देता है क्योंकि उसे पता है कि नया मिल जाएगा।
  3. तुरंत चाहिए (Instant Gratification): सब्र नाम की चीज़ का न होना।
  4. दादा-दादी का ढाल बनना: जब आप बच्चे को डांटें, तो घर के बुजुर्गों का यह कहना "अरे छोड़ो, बच्चा है, दिला दो न, मेरे पास पैसे हैं।"

इसका नुकसान क्या होगा?

शायद अभी आपको लगे कि हम तो प्यार जता रहे हैं। लेकिन यह लाड़-प्यार बच्चे को असुरक्षित और कमजोर बना रहा है।

  • भविष्य में जब उसे बाहरी दुनिया में संघर्ष (Struggle) करना पड़ेगा और वहां उसकी मांग पूरी नहीं होगी, तो वह डिप्रेशन में जा सकता है।
  • वह रिश्तों को पैसों से तोलना शुरू कर सकता है।
  • पैसों की बचत (Financial Literacy) का हुनर उसमें कभी नहीं आ पाएगा।

पेरेंट्स को क्या करना चाहिए? (The Solution)

यह सिंड्रोम कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक आदत है जिसे सुधारा जा सकता है।

  • "ना" कहना सीखें: बच्चे की हर जायज और नाजायज मांग पूरी करना प्यार नहीं है। कभी-कभी "नहीं" कहना उसे जीवन की असलियत सिखाता है।
  • बजट सिखाएं: उसे गुल्लक (Piggy Bank) दें। अगर उसे कुछ महंगा चाहिए, तो उसे कहें कि पैसे जमा करे और खुद खरीदे।
  • बुजुर्गों से बात करें: दादा-दादी और नाना-नानी को प्यार से समझाएं कि उनका आशीर्वाद चाहिए, लेकिन गिफ्ट्स की बारिश नहीं। एक सीमा (Limit) तय करें।