बंगाल की राजनीति में नई बहस चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार पर अभिषेक बनर्जी के तीखे बोल

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News India Live, Digital Desk: पश्चिम बंगाल की राजनीति में कभी शांति की उम्मीद करना थोड़ा मुश्किल होता है। चुनाव नजदीक आते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है। ताजा मामला तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दिग्गज नेता अभिषेक बनर्जी का है, जिन्होंने हाल ही में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को लेकर कुछ ऐसी बातें कही हैं, जो चर्चा का विषय बन गई हैं।

क्या है पूरी बात?

अभिषेक बनर्जी अपनी आक्रामक राजनीति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार और आयोग के तालमेल को लेकर अपनी बात रखी। राजनीति के गलियारों में चर्चा है कि बनर्जी को लगता है कि चुनाव के दौरान जो फैसले लिए जाते हैं, वे कई बार ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खाते या फिर किसी विशेष पक्ष की ओर झुके हुए महसूस होते हैं।

अभिषेक का कहना है कि चुनाव केवल 'वोट डालने' की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जनता के भरोसे का मामला है। अगर चुनाव आयोग जैसी संस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और उसके बाद बंगाल जैसे संवेदनशील राज्यों में आयोग की कार्यशैली को लेकर TMC पहले भी मुखर रही है।

अभिषेक बनर्जी के सवालों में छिपी चिंता

बात सिर्फ एक बयान की नहीं है, बात है उस प्रभाव की जो चुनाव के दौरान बंगाल की गलियों में महसूस किया जाता है। अभिषेक बनर्जी ने संकेतों में यह बताने की कोशिश की है कि बंगाल में चुनाव की तारीखों का चयन और सुरक्षा बलों की तैनाती का निर्णय स्वतंत्र रूप से लिया जाना चाहिए।

आमतौर पर देखा गया है कि विपक्षी दल अक्सर चुनाव आयोग पर केंद्र के दबाव में काम करने का आरोप लगाते हैं। लेकिन इस बार अभिषेक बनर्जी ने सीधे CEC ज्ञानेश कुमार (CEC Gyanesh Kumar) का जिक्र करते हुए मामले को और गहरा बना दिया है। उनके बयानों से साफ़ झलकता है कि पार्टी आने वाले चुनावों को लेकर अपनी रणनीतियां तो बना ही रही है, साथ ही वे किसी भी संभावित पक्षपात के खिलाफ एक रक्षात्मक कवच भी तैयार कर रहे हैं।

आम जनता पर क्या होगा असर?

जब कोई बड़ा नेता इतने बड़े संवैधानिक पद पर सवाल उठाता है, तो जनता के मन में भी संशय पैदा होता है। पश्चिम बंगाल की जनता राजनीति को बहुत गहराई से समझती है। अभिषेक बनर्जी के इन तीखे तेवरों ने बीजेपी और अन्य विरोधी दलों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि चुनाव प्रचार का असली रुख क्या होने वाला है।

अंत में सवाल वही रहता है कि क्या इस तरह की बयानबाजी से संस्थाओं पर दबाव बढ़ता है या फिर यह सुधार की एक मांग है? आने वाला चुनाव ही इन सवालों का सही जवाब देगा।