बंगाल में बनेगी नई बाबरी मस्जिद? TMC विधायक ने खोला चंदे का पिटारा, रकम सुनकर सब हैरान
News India Live, Digital Desk : देश की राजनीति में अयोध्या का राम मंदिर हमेशा चर्चा में रहा है, लेकिन अब पश्चिम बंगाल के एक छोटे से कस्बे से एक ऐसी आवाज उठ रही है, जिसने सबकी निगाहें अपनी ओर खींच ली हैं। बात हो रही है मुर्शिदाबाद (Murshidabad) की, जहाँ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक दबंग विधायक हुमायूं कबीर (Humayun Kabir) ने बाबरी मस्जिद के नाम पर एक मस्जिद बनाने का बीड़ा उठाया है।
अब इस मुहिम में नया अपडेट यह आया है कि कबीर साहब ने मस्जिद निर्माण के लिए इकट्ठे हुए चंदे (Donation) का हिसाब-किताब सार्वजनिक किया है, और यकीन मानिए, लोगों का रिस्पॉन्स देखकर लगता है कि यह मामला शांत होने वाला नहीं है।
विधायक जी का 'ड्रीम प्रोजेक्ट'
मुर्शिदाबाद के भरतपुर से विधायक, हुमायूं कबीर ने कुछ समय पहले ऐलान किया था कि वे अपने इलाके में एक मस्जिद बनवाएंगे, जो अयोध्या की बाबरी मस्जिद की याद में होगी या उसका प्रतीक होगी। उनका कहना था कि बाबरी मस्जिद को तोड़े जाने का दर्द अभी भी है और वे इसे एक श्रद्धांजलि के रूप में देख रहे हैं।
लाखों का चंदा हुआ जमा
हाल ही में एक सभा के दौरान हुमायूं कबीर ने अपनी इस मुहिम का 'प्रोग्रेस रिपोर्ट' दिया। उनका दावा है कि इस काम के लिए उन्हें जनता का भरपूर समर्थन मिल रहा है। उन्होंने बताया कि अब तक मस्जिद निर्माण के लिए लाखों रुपये (लगभग 27-28 लाख से ज्यादा) का चंदा इकट्ठा हो चुका है। यह रकम आम लोगों ने, दुकानदारों ने और उनके समर्थकों ने दी है।
कबीर ने बड़े जोश में कहा कि यह पैसा इस बात का सबूत है कि लोग क्या चाहते हैं। उनका इरादा इस प्रोजेक्ट को जल्द से जल्द रफ़्तार देने का है।
सियासी बवाल तो होना ही था
जैसे ही "बाबरी" नाम जुड़ा, विवाद अपने आप खड़ा हो गया। भाजपा (BJP) इस कदम को पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण (Communal Polarization) की कोशिश बता रही है। उनका कहना है कि जहाँ देश आगे बढ़ रहा है, वहां TMC विधायक पुरानी बातों को कुरेद कर समाज को बांटने का काम कर रहे हैं। वहीं, हुमायूं कबीर का कहना है कि यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है और वे अपने धर्म और समुदाय के लिए यह कर रहे हैं।
मस्जिद का प्लान क्या है?
बताया जा रहा है कि यह मस्जिद काफी भव्य होगी। इसके लिए जमीन और नक्शे पर काम चल रहा है। कबीर ने तो यहाँ तक कह दिया कि यह सिर्फ ईंट-गारे की इमारत नहीं, बल्कि उनके जज़्बात हैं। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां याद रखें।
आगे क्या?
चंदा तो इकट्ठा हो गया, लेकिन क्या प्रशासन और राज्य का माहौल उन्हें यह निर्माण आसानी से पूरा करने देगा? यह एक बड़ा सवाल है। पश्चिम बंगाल की राजनीति वैसे ही काफी गरम रहती है, और हुमायूं कबीर की यह ज़िद्द आने वाले दिनों में और बड़ी हेडलाइन्स बनाएगी।
फिलहाल, हुमायूं कबीर पैसों का हिसाब देकर यह जताना चाहते हैं कि वो अकेले नहीं हैं, भीड़ उनके साथ खड़ी है।