छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का तांडव, घर के पास ही पूर्व सरपंच की बेरहमी से हत्या
News India Live, Digital Desk: ताज़ा मामला बीजापुर जिले का है, जहाँ एक पूर्व सरपंच को अपनी जान गंवानी पड़ी है। बताया जा रहा है कि नक्सलियों ने इस वारदात को अंजाम दिया। यह खबर महज़ एक 'आंकड़ा' नहीं है, बल्कि उस डर की गूंज है जो वहां के गांवों में लोग हर दिन महसूस करते हैं।
क्या हुआ था उस रात?
शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बीजापुर के एक अंदरूनी गांव में रहने वाले पूर्व सरपंच को निशाना बनाया गया। आमतौर पर ऐसे मामलों में नक्सली किसी भी नेता या सक्रिय सामाजिक व्यक्ति को 'पुलिस मुखबिर' या 'विचारधारा विरोधी' होने का लेबल लगा देते हैं। इस घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा, जब रात के अंधेरे या घात लगाकर बैठे नक्सलियों ने इस पूर्व जन-प्रतिनिधि पर हमला किया और उनकी जान ले ली।
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल
कल्पना कीजिए उस परिवार की, जिसने अपना मुखिया खोया है। जो व्यक्ति सालों तक पंचायत की समस्याओं के लिए लड़ता रहा, अपने गांव की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं के लिए खड़ा रहा, आज उसी का शरीर वहां पड़ा है। ग्रामीणों में भी भारी रोष है, लेकिन डर इतना है कि खुलकर कोई बोलने को तैयार नहीं है। बस्तर में 'खामोशी' ही अक्सर बचाव का जरिया मानी जाती है।
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई
जैसे ही सूचना मिली, पुलिस टीम ने मौके पर पहुँचने की कोशिश की। लेकिन आप जानते हैं, बीजापुर जैसे इलाकों में सुरक्षाबलों के लिए अंदरूनी गांवों तक पहुंचना आसान नहीं होता। रास्तों में आईईडी (IED) का खतरा और पेचीदा जंगल इस मिशन को और कठिन बना देते हैं। पुलिस का कहना है कि उन्होंने मामला दर्ज कर लिया है और इलाके में 'सर्च ऑपरेशन' तेज कर दिया गया है।
क्यों निशाना बनते हैं स्थानीय प्रतिनिधि?
दरअसल, पूर्व सरपंच या पंचायत स्तर के नेता शासन और आम जनता के बीच की कड़ी होते हैं। जब ये लोग विकास की बात करते हैं या सरकार की योजनाओं को लागू कराते हैं, तो अक्सर ये उन ताकतों की आंखों की किरकिरी बन जाते हैं जो व्यवस्था को चुनौती देना चाहती हैं। बीजापुर की यह घटना इसी कड़वी हकीकत की याद दिलाती है।
सुलगता सवाल:
आखिर कब तक मासूम लोगों और जन-प्रतिनिधियों का खून यूँ ही सड़कों पर गिरता रहेगा? सरकार विकास का दावा तो करती है, लेकिन उन अंदरूनी बस्तियों में बैठे लोगों का भरोसा जीतना अब भी एक बहुत बड़ी चुनौती है।
इस दुखद घटना पर आपकी क्या संवेदनाएं हैं? क्या आपको लगता है कि सिर्फ हथियार के दम पर इस खौफ को खत्म किया जा सकता है, या कुछ और रास्ता निकालना होगा? कमेंट्स में जरूर अपनी बात साझा करें।