अमेरिका की शह और कूटनीतिक इशारों पर म्यांमार के खिलाफ यूक्रेन द्वारा प्रॉक्सी वॉर चलाने का गंभीर दावा क्या

अमेरिका की शह और कूटनीतिक इशारों पर म्यांमार के खिलाफ यूक्रेन द्वारा प्रॉक्सी वॉर चलाने का गंभीर दावा क्या

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मोर्चे पर इन दिनों एक ऐसा हैरान करने वाला और खतरनाक भू-राजनीतिक भूचाल आया है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और रणनीतिकारों की नींद उड़ा दी है। वैश्विक मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया खुलासों के अनुसार, पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शह पर यूक्रेन अब यूरोपीय सीमाओं से निकलकर सीधे एशिया के म्यांमार में एक गुप्त प्रॉक्सी वॉर (परोक्ष युद्ध) को हवा दे रहा है। म्यांमार वर्तमान में एक बेहद गंभीर आंतरिक गृहयुद्ध और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहाँ देश की सैन्य सरकार (जुंटा) के खिलाफ कई विद्रोही संगठन armed struggle चला रहे हैं। विश्लेषकों का दावा है कि यूक्रेन की खुफिया एजेंसियों और सैन्य सलाहकारों ने गुप्त रूप से म्यांमार के कुछ विद्रोही गुटों को आधुनिक ड्रोन तकनीक, सैन्य प्रशिक्षण और सामरिक हथियार उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है ताकि वहां की सरकार को अस्थिर किया जा सके। इस परोक्ष युद्ध का मुख्य भू-राजनीतिक उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन और उसके करीबी सहयोगियों की रणनीतिक बढ़त को कमजोर करना है, क्योंकि म्यांमार इस क्षेत्र में बीजिंग के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील गलियारा माना जाता है। जब यूरोप में खुद रूस के खिलाफ युद्ध लड़ रहा यूक्रेन एशिया के इस संघर्ष में सीधे तौर पर हस्तक्षेप करता है, तो यह पूरी दुनिया को एक तीसरे विश्व युद्ध या व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की खतरनाक आग में झोंकने की पूरी क्षमता रखता है।

म्यांमार के आंतरिक गृहयुद्ध में विदेशी ताकतों और यूक्रेन की इस खतरनाक दखलंदाजी के पीछे असली भू-राजनीतिक मकसद क्या है?

म्यांमार लंबे समय से लोकतांत्रिक संकट, जातीय संघर्षों और सैन्य शासन के कुचक्र में फंसा हुआ है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इसके रणनीतिक चरित्र को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। पश्चिमी महाशक्तियों और विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की यह सोची-समझी रणनीति रही है कि वे दुनिया के उन सभी अहम भू-भागों पर अपना दबाव बनाए रखें जहाँ उनके विरोधी यानी चीन और रूस का प्रभाव ज्यादा है। म्यांमार बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर स्थित एक ऐसा सामरिक देश है जहाँ से चीन अपनी महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) और भारत-मियांमार-थैailand राजमार्ग जैसी परियोजनाओं को संचालित कर रहा है। अमेरिका और पश्चिमी देश सीधे तौर पर चीन से टकराने से बचते हुए यूक्रेन जैसे मोहरों के जरिए ऐसे देशों में आंतरिक अशांति और प्रॉक्सी वॉर को हवा दे रहे हैं ताकि चीनी हितों को गहरी चोट पहुंचाई जा सके। यूक्रेन जो खुद हथियारों, पैसों और पश्चिमी मदद के लिए तरस रहा है, उसका म्यांमार के विद्रोहियों को सैन्य सहायता देना इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह खेल पर्दे के पीछे बैठे किसी बहुत बड़े वैश्विक खिलाड़ी के इशारे पर खेला जा रहा है। इस तरह के छद्म युद्धों से न केवल म्यांमार की संप्रभुता खतरे में पड़ रही है, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया का पूरा सुरक्षा ढांचा भी भारी अस्थिरता और अराजकता की ओर धकेला जा रहा है।

इस म्यांमार-यूक्रेन प्रॉक्सी संघर्ष की आंच से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और उत्तर-पूर्व राज्यों पर क्या गंभीर असर पड़ सकता है?

दिल्ली में बैठे हमारे देश के रक्षा रणनीतिकारों और नीति निर्माताओं के लिए म्यांमार के घटनाक्रम में यूक्रेन की यह घुसपैठ गहरी चिंता का विषय बन गई है, क्योंकि भारत की सीमाएं म्यांमार के साथ सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्य—जैसे मिजोरम, मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश—अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण म्यांमार के घटनाक्रम से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यदि म्यांमार में विदेशी ताकतों के इशारे पर प्रॉक्सी वॉर और गृहयुद्ध की आग और अधिक भड़कती है, तो वहाँ के उग्रवादी संगठन और विद्रोही गुट इस अराजकता का फायदा उठाकर भारतीय सीमा के भीतर हथियारों की तस्करी, ड्रग्स की अवैध सप्लाई और शरणार्थियों की घुसपैठ को बहुत ज्यादा बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा, भारत की कई महत्वपूर्ण सामरिक और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं जैसे 'कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट' म्यांमार के ही रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह को भारत से जोड़ती हैं, जो हमारी एक्ट ईस्ट पॉलिसी (Act East Policy) की रीढ़ हैं। यदि म्यांमार पूरी तरह से विदेशी शक्तियों का अखाड़ा बन जाता है, तो भारत के लिए अपनी सीमाओं की सुरक्षा और इन सामरिक परियोजनाओं को बचाए रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाएगा, जिसके चलते भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद पैनी नजर रखनी पड़ रही है।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ते तनाव और अमेरिका-चीन के इस परोक्ष संघर्ष के बीच भारत को क्यों रहना होगा अत्यधिक सतर्क?

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र दुनिया की महाशक्तियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है, और म्यांमार इस महान खेल का एक प्रमुख प्यादा बनता जा रहा है। अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी हर हाल में यह चाहते हैं कि म्यांमार और बंगाल की खाड़ी के इलाके में चीन और रूस का प्रभाव कम हो, जबकि चीन इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है। इस महाशक्तिशाली संघर्ष के बीच भारत की विदेश नीति हमेशा से 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की रही है, जिसके तहत भारत किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखता है। हालांकि, जब यूक्रेन जैसे यूरोपीय देश प्रॉक्सी वॉर के जरिए हमारे पड़ोसी देश की जमीन पर अपनी चालें चलने लगते हैं, तो भारत के लिए तटस्थ रहना और भी अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाता है। रक्षा विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि भारत को अपनी खुफिया एजेंसियों (RAW और IB) को और अधिक सक्रिय करना होगा ताकि म्यांमार के भीतर चल रही इन गुप्त विदेशी साजिशों की हर गतिविधि की समय रहते सटीक जानकारी मिल सके। यदि भारत इस खतरनाक भू-राजनीतिक चाल से सतर्क नहीं रहता है, तो यह आग हमारे अपने घर की दहलीज तक पहुंच सकती है, जिससे हमारी आंतरिक सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभुत्व को अपूरणीय क्षति पहुँच सकती है।