फाइटर एसेट्स का कोई स्थाई बंटवारा नहीं होगा, विदेशी मॉडल की नकल नहीं करेंगे

फाइटर एसेट्स का कोई स्थाई बंटवारा नहीं होगा, विदेशी मॉडल की नकल नहीं करेंगे

भारतीय वायुसेना (IAF) के प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने देश की रक्षा रणनीतियों और तीनों सेनाओं के एकीकरण (थिएटर कमांड) को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा बयान दिया है। वायुसेना प्रमुख ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय वायुसेना के 'फाइटर एसेट्स' यानी लड़ाकू विमानों और हवाई हमलावर प्रणालियों का किसी भी परिस्थिति में कोई स्थाई बंटवारा नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ किया कि भारत अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुसार अपनी नीतियां खुद तय करेगा और किसी भी विदेशी थिएटर कमांड मॉडल की अंधी नकल नहीं करेगा। वायुसेना प्रमुख के इस साहसी और यथार्थवादी बयान के बाद देश के रक्षा गलियारों में एक नई और गंभीर चर्चा छिड़ गई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एयर चीफ मार्शल एपी सिंह का यह बयान देश की रणनीतिक स्वायत्तता, युद्धकालीन प्रभावशीलता और हवाई परिसंपत्तियों के इष्टतम उपयोग के लिहाज से एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।

लड़ाकू बेड़े की केंद्रीकृत कमान और फाइटर एसेट्स का लचीला उपयोग

भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आधुनिक युद्धों में 'हवाई ताकत' (Air Power) की सबसे बड़ी खूबी उसकी गति, लचीलापन और मारक क्षमता होती है। यदि लड़ाकू विमानों और मिसाइल प्रणालियों को अलग-अलग थिएटर्स या सैन्य कमानों में स्थाई रूप से बांट दिया जाएगा, तो इससे वायुसेना की त्वरित प्रतिक्रिया देने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। एयर चीफ मार्शल का मानना है कि किसी भी आपात स्थिति या युद्ध के दौरान लड़ाकू बेड़े का नियंत्रण एक केंद्रीय कमान के पास होना अनिवार्य है, ताकि आवश्यकता के अनुसार जेट्स को तुरंत एक थिएटर से दूसरे थिएटर में शिफ्ट किया जा सके। किसी भी देश के पास लड़ाकू विमानों की संख्या सीमित होती है, और ऐसे में उन्हें सीमाओं पर स्थाई रूप से बांट देना युद्ध कौशल और रणनीतिक दृष्टिकोण से एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।

पश्चिमी या चीनी मॉडलों की अंधी नकल के सख्त खिलाफ भारत की रणनीति

थिएटर कमांड सिस्टम को लेकर अक्सर अमेरिका और चीन जैसे देशों के सैन्य ढांचों का उदाहरण दिया जाता है। हालांकि, वायुसेना प्रमुख एपी सिंह ने इस अवधारणा पर अपनी बात रखते हुए कहा कि भारत की भौगोलिक स्थितियां, खतरे और संसाधन पश्चिमी या अन्य विदेशी देशों से पूरी तरह अलग हैं। अमेरिका के पास महासागरों के पार युद्ध लड़ने का विशाल अनुभव और संसाधन हैं, जबकि चीन का सैन्य मॉडल उसकी अपनी राजनीतिक संरचना के हिसाब से बना है। भारत को अपनी तीनों सेनाओं—थल सेना, नौसेना और वायुसेना—के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए एक 'मेड इन इंडिया' और 'स्वदेशी' मॉडल अपनाना होगा। विदेशी मॉडलों की अंधी नकल करने से हमारी युद्ध लड़ने की क्षमता में सुधार होने के बजाय रुकावटें पैदा हो सकती हैं। इसलिए भारत को अपनी रक्षा जरूरतों और सीमाओं के यथार्थ को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ना चाहिए।

तीनों सेनाओं में बेहतर तालमेल और स्वदेशी थिएटर कमांड की आवश्यकता

वायुसेना प्रमुख ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय वायुसेना थिएटर कमांड या तीनों सेनाओं के एकीकरण (Jointness) की विरोधी नहीं है, बल्कि वह इसके अधिक व्यावहारिक और परिणाम-उन्मुख क्रियान्वयन के पक्ष में है। उन्होंने कहा कि थल सेना, नौसेना और वायुसेना को मिलकर काम करने की सख्त जरूरत है, लेकिन यह एकीकरण इस तरह से होना चाहिए कि किसी भी बल की अपनी विशिष्ट क्षमताओं और सामर्थ्य को नुकसान न पहुंचे। युद्ध के मैदान में तीनों सेनाओं के बीच केवल प्रशासनिक एकीकरण ही काफी नहीं होता, बल्कि एक ऐसा एकीकृत कमान ढांचा चाहिए जो युद्ध की स्थिति में तुरंत और सटीक फैसले ले सके। स्वदेशी आवश्यकताओं के अनुसार तैयार किया गया थिएटर मॉडल ही भारत को भविष्य के 'हाइब्रिड' और बहु-आयामी युद्धों (Multi-Domain Warfare) में निर्णायक बढ़त दिला सकता है।

भविष्य के हवाई युद्ध और वायुसेना का आधुनिकीकरण का रोडमैप

अपने संबोधन के दौरान एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने भारतीय वायुसेना के तेजी से हो रहे आधुनिकीकरण और लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या बढ़ाने की प्रतिबद्धता को भी दोहराया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में केवल विमानों की संख्या ही मायने नहीं रखती, बल्कि अत्याधुनिक तकनीक, स्टील्थ क्षमताएं, उन्नत रडार और सटीक मार करने वाले हथियार युद्ध का पासा पलटते हैं। मेक इन इंडिया पहल के तहत स्वदेशी तेजस फाइटर जेट्स, एएमसीए (AMCA) प्रोजेक्ट और एडवांस्ड हथियारों का बेड़े में शामिल होना वायुसेना की रीढ़ को मजबूत कर रहा है। वायुसेना प्रमुख का यह बयान न केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा के प्रति एक मजबूत संदेश देता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि भारतीय रक्षा बल अपनी रणनीतियों और परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह परिपक्व, आत्मनिर्भर और दूरदर्शी रुख अपनाए हुए हैं।