'चीन-पाक के बीच कोई सीमा नहीं': PoK पर संयुक्त आयोग को भारत ने बताया पूरी तरह अवैध, बंद करे नाटकबाजी

'चीन-पाक के बीच कोई सीमा नहीं': PoK पर संयुक्त आयोग को भारत ने बताया पूरी तरह अवैध, बंद करे नाटकबाजी

भारत सरकार ने पाकिस्तान और चीन के बीच सीमा प्रबंधन के नाम पर चल रही तथाकथित द्विपक्षीय गतिविधियों और नए संयुक्त तंत्र को एक बार फिर कड़े शब्दों में खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंच पर दोनों देशों की सांठगांठ को बेनकाब किया है। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्ट और गैर-संदेहास्पद शब्दों में कहा है कि भौगोलिक, ऐतिहासिक और कानूनी रूप से पाकिस्तान और चीन के बीच कोई साझी अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद ही नहीं है। ऐसे में दोनों देशों द्वारा स्थापित किए गए तथाकथित 'पाकिस्तान-चीन सीमा संयुक्त आयोग' (Pakistan-China Boundary Joint Commission) का कोई वैध अंतरराष्ट्रीय या विधिक आधार नहीं है। भारत ने दो टूक चेतावनी देते हुए कहा है कि पाकिस्तान द्वारा जबरन और अवैध रूप से कब्जाए गए भारतीय भूभाग (PoK) पर बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच किसी भी प्रकार की बातचीत, सर्वेक्षण, संयुक्त आयोग या समझौता पूरी तरह से शून्य, गैर-कानूनी और भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर सीधा हमला है।

साप्ताहिक प्रेस वार्ता के दौरान अंतरराष्ट्रीय और घरेलू मीडिया के तीखे सवालों का औपचारिक उत्तर देते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भारत की संप्रभु स्थिति को अत्यंत दृढ़ता से रेखांकित किया। प्रवक्ता ने कहा कि भारत सरकार ने हाल ही में बीजिंग और इस्लामाबाद के बीच सीमा आयोग की बैठकों से संबंधित रिपोर्टों को देखा है और इस विषय पर भारत का राष्ट्रीय रुख हमेशा की तरह बिल्कुल स्पष्ट, अटल और सुसंगत रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान और चीन के बीच जमीन पर कोई सीधी सीमा नहीं लगती; जो क्षेत्र इन दोनों देशों को जोड़ता दिखता है, वह वास्तव में भारत का अभिन्न अंग पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का क्षेत्र है, जिसे पाकिस्तान ने 1947 में सैन्य आक्रामकता के जरिए अवैध रूप से कब्जा कर रखा है। इसलिए किसी भी अवैध कब्जे वाले क्षेत्र पर कोई तीसरा देश या कब्जा करने वाली सत्ता किसी प्रकार का कानूनी अधिकार नहीं रखती है।

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत के अविभाज्य अंग: कब्जे वाले क्षेत्र पर समझौते का अधिकार शून्य

विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में इस बुनियादी सत्य को दोहराया कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश सदैव से भारत के अभिन्न और अविभाज्य अंग रहे हैं, हैं और भविष्य में भी हमेशा रहेंगे। इस अकाट्य सच्चाई को न तो पाकिस्तान का अवैध सैन्य कब्जा बदल सकता है और न ही चीन की कोई कूटनीतिक या आर्थिक परियोजना। भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकारों ने स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान एक कब्जाधारी राष्ट्र है और उसे भारतीय संप्रभुता वाले किसी भी क्षेत्र के संबंध में किसी भी विदेशी ताकत के साथ कोई संधि, सीमांकन, व्यापारिक समझौता या ढांचागत निर्माण करने का रत्ती भर भी नैतिक या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है।

भारत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान अपने घरेलू राजनीतिक संकटों और आर्थिक बदहाली से ध्यान भटकाने के लिए समय-समय पर चीन के साथ मिलकर सीमा वार्ता का यह राजनीतिक नाटक रचता रहता है। नई दिल्ली ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह याद दिलाया कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत पाकिस्तान को सबसे पहले पीओके से अपनी सेना और अवैध उपस्थिति को पूरी तरह हटाना होगा। भारत ने कहा कि जिस जमीन पर पाकिस्तान का मालिकाना हक ही नहीं है, उस पर बीजिंग के साथ मिलकर संयुक्त आयोग बनाना केवल अंतरराष्ट्रीय कानूनों की आंखों में धूल झोंकने का एक हास्यास्पद प्रयास है, जिसे भारत कभी स्वीकार नहीं करेगा।

1963 का चीन-पाक सीमा समझौता अवैध और अमान्य: शक्सगाम घाटी पर भारत का संप्रभु दावा अडिग

विदेश मंत्रालय ने ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाते हुए यह भी दोहराया कि भारत ने 2 मार्च 1963 को हस्ताक्षरित तथाकथित 'चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते' को न तो कभी मान्यता दी है और न ही भविष्य में कभी स्वीकार करेगा। भारत ने शुरू से ही इस समझौते को पूरी तरह अवैध, अमान्य और प्रभावहीन माना है। गौरतलब है कि 1963 के इसी विवादित समझौते के तहत पाकिस्तान ने भारत के वैध अधिकार क्षेत्र वाली शक्सगाम घाटी (Shaksgam Valley) का 5,180 वर्ग किलोमीटर से अधिक का भारतीय इलाका अवैध रूप से चीन को उपहार स्वरूप सौंप दिया था। यह समझौता केवल भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने और क्षेत्र में भारत-विरोधी सामरिक धुरी तैयार करने के उद्देश्य से किया गया एक अवांछित कूटनीतिक षड्यंत्र था।

भारत ने साफ कर दिया है कि 1963 के समझौते के आधार पर किए जाने वाले किसी भी प्रकार के सीमा निर्धारण, खंभे गाड़ने की प्रक्रिया या वर्तमान में सीपीईसी (CPEC - चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) के तहत किए जा रहे किसी भी निर्माण कार्य को भारत अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का खुला उल्लंघन मानता है। भारतीय प्रवक्ता ने रेखांकित किया कि जब मूल समझौता ही अवैध है, तो उसके आधार पर गठित कोई भी 'संयुक्त आयोग' वैध नहीं हो सकता। भारत सरकार ने दोहराया कि भारतीय सीमाओं के किसी भी हिस्से में विदेशी उपस्थिति या तीसरे पक्ष का दखल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए असहनीय है और ऐसे किसी भी कृत्य के खिलाफ भारत अपने संप्रभु अधिकारों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

सीपीईसी और शक्सगाम में चीनी गतिविधियों पर भारत की पैनी नजर: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घेराबंदी

भारत ने चीन और पाकिस्तान के बीच अवैध रूप से कब्जाए गए कश्मीर में चल रहे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की गतिविधियों और शक्सगाम घाटी में हाल के दिनों में देखे गए चीनी सैन्य बुनियादी ढांचे के विस्तार पर भी अपनी गहरी चिंता और कड़ा विरोध दर्ज कराया है। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि काराकोरम हाईवे और आसपास के क्षेत्रों में दोनों देशों द्वारा तथाकथित सीमा निगरानी के नाम पर की जा रही गतिविधियां वास्तव में भारत के उत्तरी और पश्चिमी मोर्चों पर दोहरे खतरे (Two-Front Threat) को बढ़ाने का एक सुनियोजित प्रयास हैं।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि कोई भी आर्थिक निवेश या सीमा संबंधी दिखावा इस क्षेत्र की वास्तविक स्थिति को बदल नहीं सकता। भारत ने बीजिंग और इस्लामाबाद दोनों को आगाह किया है कि वे इस प्रकार के गैर-कानूनी और उकसावे वाले कार्यों से तुरंत बाज आएं और भारतीय क्षेत्र की यथास्थिति को बदलने की किसी भी एकतरफा कोशिश को बंद करें। भारत अपनी सीमाओं की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा और इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मंचों पर पाकिस्तान और चीन दोनों की संयुक्त चालबाजियों का आक्रामक रूप से पर्दाफाश करता रहेगा।