संयुक्त राष्ट्र के 'करेक्ट द मैप' प्रस्ताव से बदलेगा वैश्विक मानचित्र, भारत और अफ्रीकी देशों का आकार अब दिखेगा बिल्कुल सटीक और विशाल
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वैश्विक मानचित्रों को महाद्वीपों और देशों के वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब और सटीक दिखाने वाला यह बहुप्रतीक्षित ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति, कूटनीति और भूगोल के क्षेत्र में इस कदम को बेहद क्रांतिकारी माना जा रहा है क्योंकि सदियों से चली आ रही भौगोलिक विसंगतियों और नक्शों के पारंपरिक भ्रम को दूर करने की दिशा में यह सबसे बड़ा और प्रभावी वैश्विक प्रयास है। टोगो की ओर से आधिकारिक तौर पर पेश किए गए और अफ्रीकी संघ के पूर्ण समर्थन वाले इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव के पक्ष में दुनिया के कुल 164 देशों ने मतदान किया, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वैश्विक समुदाय अब मानचित्रों में समानता और यथार्थता चाहता है। इस प्रस्ताव के विरोध में केवल संयुक्त राज्य अमेरिका खड़ा नजर आया, जबकि एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, सर्बिया और यूक्रेन जैसे कुछ देशों ने इस संवेदनशीलता और कूटनीतिक नफा-नुकसान को भांपते हुए मतदान से पूरी तरह दूरी बनाए रखी। भारत ने इस प्रस्ताव का खुलकर स्वागत किया और इसके पक्ष में अपना स्पष्ट वोट देकर यह साबित कर दिया कि वह वैश्विक मंच पर भौगोलिक न्याय और समानता का हमेशा से प्रबल समर्थक रहा है। हालांकि तकनीकी रूप से यह प्रस्ताव किसी भी सदस्य देश पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसके नैतिक और व्यावहारिक प्रभाव दूरगामी होंगे। अब विभिन्न राष्ट्रीय सरकारें, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां, शैक्षणिक संस्थान, मीडिया हाउस, डिजिटल मैप प्लेटफॉर्म और आधिकारिक प्रकाशन स्कूलों, किताबों और डिजिटल नक्शों में मौजूदा पारंपरिक मर्केटर प्रक्षेपण की जगह समान-क्षेत्रफल वाले वैज्ञानिक और यथार्थवादी नक्शों को बढ़ावा दे सकेंगे और उनका खुलकर उपयोग कर पाएंगे। मोटे तौर पर दुनिया के नए डिजिटल और भौतिक नक्शे में अब भारत का नक्शा काफी बड़ा और अधिक वास्तविक दिखेगा, जबकि अफ्रीका और दुनिया के दर्जनों अन्य विकासशील व दक्षिणी गोलार्ध के देशों का सही आकार पहली बार वैश्विक स्तर पर सही तरीके से सामने आ सकेगा।
सदियों पुराने दोषपूर्ण मर्केटर नक्शे और उसके ऐतिहासिक प्रभावों की दास्तान बेहद दिलचस्प और भौगोलिक राजनीति से जुड़ी हुई है।
यह समझना बेहद आवश्यक है कि आखिर यह प्रस्ताव दुनिया के पटल पर क्यों लाया गया और इसके पीछे की मुख्य ऐतिहासिक वजहें क्या थीं। दरअसल, सदियों से चले आ रहे पारंपरिक मर्केटर नक्शे ने कभी भी दुनिया का सही और वास्तविक चित्र सामने नहीं रखा था। इस नक्शा बनाने की पद्धति का आविष्कार सोलहवीं सदी में मुख्य रूप से शिपिंग और समुद्री नेविगेशन करने वालों के लिए किया गया था, ताकि नाविक समुद्र में आसानी से सीधे रास्तों पर नेविगेट कर सकें। लेकिन इस पद्धति की सबसे बड़ी तकनीकी और व्यावहारिक कमजोरी यह थी कि यह पृथ्वी के ध्रुवों के पास स्थित इलाकों को अत्यधिक बड़ा और भूमध्य रेखा के पास स्थित उष्णकटिबंधीय महाद्वीपों को उनकी वास्तविक क्षमता से काफी छोटा दिखाता था। इसका सबसे बड़ा और चौंकाने वाला परिणाम यह हुआ कि विशालकाय अफ्रीकी महाद्वीप, जो आकार में ग्रीनलैंड से लगभग चौदह गुना बड़ा होने के बावजूद पारंपरिक नक्शों में ग्रीनलैंड से भी छोटा या लगभग बराबर दिखाई देता था। इसी तरह अमेरिका और कई अन्य पश्चिमी और यूरोपीय देश मानचित्र पर अपने वास्तविक क्षेत्रफल से कई गुना ज्यादा विशाल और शक्तिशाली खंड की तरह उभरते थे, जबकि अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका जैसे महत्वपूर्ण भूभागों का आकार बहुत छोटा, संकुचित और सिकुड़ा हुआ पेश किया जाता था। इस प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र के मंच से साफ शब्दों में यह कहा गया है कि नक्शों की यह पुरानी विकृति दुनिया की एक बेहद असंतुलित, पश्चिमी-केंद्रित और भ्रामक छवि बनाती है, जिसे सुधारा जाना आज के आधुनिक और न्यायप्रिय समय की सबसे बड़ी और अनिवार्य मांग बन चुकी है। यद्यपि इस बदलाव से किसी भी देश का वास्तविक भौगोलिक क्षेत्रफल एक इंच भी नहीं बढ़ने जा रहा है, लेकिन सबसे बड़ा और सकारात्मक फर्क यह होगा कि समान-क्षेत्रफल वाले इन नए वैज्ञानिक नक्शों पर भारत और संपूर्ण दक्षिण एशिया यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के मुकाबले कहीं अधिक वास्तविक और न्यायसंगत अनुपात में दिखाई देंगे।
वैश्विक कूटनीति, शिक्षा व्यवस्था और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इस बड़े बदलाव के क्या होंगे दूरगामी और गहरे प्रभाव।
स्कूलों की कक्षाओं, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों और समाचारों में अब देश का भौगोलिक वजन और महत्व छोटा या उपेक्षित नहीं लगेगा, बल्कि नई पीढ़ी भूगोल को बिल्कुल सटीक परिप्रेक्ष्य में सीख सकेगी। भारत ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट करते हुए यह दोहराया है कि वह हमेशा से ऐसे नक्शों और वैज्ञानिक पद्धतियों का पुरजोर समर्थन करता है जो महाद्वीपों और देशों का आपसी आकार सही और यथार्थवादी रखें। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव रघू पुरी ने इस विषय पर अपने विचार रखते हुए बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा कि नक्शे केवल कागजी टुकड़े नहीं होते, बल्कि वे यह तय करते हैं कि कोई भी समाज भूगोल, अंतरिक्ष और दुनिया के वास्तविक पैमाने को किस नजरिए से समझता है और आत्मसात करता है। यही कारण है कि भारत ने इस प्रस्ताव के मूल इरादे और वैचारिक उद्देश्यों का तहेदिल से स्वागत किया है। उन्होंने अपनी बात को आगे जोड़ते हुए यह भी स्पष्ट किया कि इसे किसी एक विशेष कार्टोग्राफिक पद्धति या भौगोलिक सॉफ्टवेयर का अंतिम समर्थन नहीं समझा जाना चाहिए, बल्कि यह वैश्विक मानचित्रकला में सुधार की शुरुआत है। आने वाले समय में स्कूल की नई किताबें, सरकारी प्रस्तुतियाँ, डिजिटल मानचित्र और गूगल मैप्स या अन्य नेविगेशन ऐप्स कितनी जल्दी इस बदलाव को अपनाते हैं, यह अब पूरी तरह से विभिन्न सदस्य देशों और संबंधित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा। भौगोलिक न्याय की दिशा में उठाया गया यह कदम आने वाली पीढ़ियों के लिए दुनिया को देखने का नजरिया पूरी तरह से बदल देगा और हर देश को वैश्विक मानचित्र पर उसका वास्तविक और गौरवशाली स्थान दिलाने में मील का पत्थर साबित होगा।