135 साल पुरानी सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी को शिफ्ट करने की सुगबुगाहट पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत

135 साल पुरानी सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी को शिफ्ट करने की सुगबुगाहट पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत

राजधानी दिल्ली के गलियारों से इस वक्त एक बहुत बड़ी और बेहद अहम खबर सामने आ रही है, जो देश के इतिहास, संस्कृति और अकादमिक धरोहर से जुड़ी हुई है। देश की दूसरी सबसे पुरानी और करीब 135 साल पुरानी ऐतिहासिक सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी (CSL) को उसकी मौजूदा जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने की चल रही तैयारियों के बीच अब देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने खुद इस मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) ले लिया है। सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना और शास्त्री भवन के ढहाए जाने की प्रक्रिया के बीच इस प्रतिष्ठित पुस्तकालय के भविष्य, इसके दुर्लभ संग्रह और उसमें मौजूद साढ़े आठ लाख से अधिक किताबों के संरक्षण को लेकर अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था। कोर्ट के इस कदम के बाद से प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है, क्योंकि यह लाइब्रेरी केवल किताबों का संग्रह नहीं बल्कि भारत के प्रशासनिक और ऐतिहासिक विकास का एक जीवंत दस्तावेज है, जिसके वजूद को सुरक्षित रखना हर नागरिक और सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है।

क्या है 135 साल पुरानी सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी का गौरवशाली इतिहास और इसका महत्व

इस ऐतिहासिक पुस्तकालय की जड़ें ब्रिटिश काल में वर्ष 1891 तक गहरी जाती हैं, जब इसकी स्थापना कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में की गई थी। इसके बाद जब साल 1911 में ब्रिटिश भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित किया गया, तो इस लाइब्रेरी को भी दिल्ली लाया गया। समय के साथ इसके ठिकानों में बदलाव होते रहे और 1930 के दशक में नार्थ ब्लॉक के निर्माण के बाद इसे वहां जगह मिली, और अंततः 1969 में इसे शास्त्री भवन में स्थापित कर दिया गया, जहां यह पिछले कई दशकों से अनवरत रूप से शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी सेवाएं दे रही है। इस लाइब्रेरी में आज के समय में लगभग 8.5 लाख से अधिक पुस्तकों, दुर्लभ पांडुलिपियों, प्राचीन सरकारी दस्तावेजों, गजेटियर्स और महत्वपूर्ण रिपोर्ट्स का विशाल भंडार मौजूद है। इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के शोधार्थियों के लिए यह जगह किसी मंदिर से कम नहीं है, जहां देश-विदेश के विद्वान महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाने के लिए पहुंचते हैं।

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत शास्त्री भवन के डिमोलिशन और रीलोकेशन पर क्यों मचा है बवाल

मौजूदा समय में नई दिल्ली में चल रहे विशाल सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास प्रोजेक्ट के तहत कई पुराने सरकारी कार्यालयों और इमारतों को गिराए जाने का काम तेजी से चल रहा है। इसी कड़ी में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा शास्त्री भवन को खाली करने और गिराए जाने के निर्देश दिए जाने के बाद इस लाइब्रेरी के भविष्य को लेकर संकट के बादल मंडराने लगे। मीडिया रिपोर्ट्स और विभिन्न साक्ष्यों में यह बात सामने आई कि नई योजनाओं के तहत इस विशाल ग्रंथालय के लिए पर्याप्त और अनुकूल जगह के आवंटन को लेकर स्पष्टता की कमी है। हालांकि सरकार की तरफ से यह स्पष्टीकरण भी सामने आ चुका है कि कर्तव्य पथ पुनर्विकास योजना के अंतर्गत ही इस लाइब्रेरी के वास्ते नई जगह का प्रावधान किया गया है और इसके निर्माण की प्रक्रिया पर काम चल रहा है। इसके बावजूद, संस्कृति मंत्रालय और अन्य संबंधित पक्षों के बीच इस बात को लेकर चिंता जताई जाती रही है कि इतनी भारी मात्रा में मौजूद पुरानी, नायाब और संवेदनशील किताबों को सुरक्षित रूप से स्टोर करने के लिए सामान्य स्थान नाकाफी साबित हो सकता है और पूरी तरह से रीलोकेट करना तकनीकी रूप से बेहद जटिल है।

सुप्रीम कोर्ट का स्वतः संज्ञान: अब देश की सर्वोच्च अदालत तय करेगी ऐतिहासिक किताबों का भाग्य

मामले की गंभीरता को भांपते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम का खुद संज्ञान लिया है और इसे एक जनहित या स्वतः संज्ञान मामले के रूप में सूचीबद्ध किया है। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सहदेव की पीठ इस मामले की सुनवाई करने जा रही है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि देश की इस अमूल्य बौद्धिक और ऐतिहासिक धरोहर के साथ किसी भी प्रकार की कोताही न बरती जाए। कोर्ट यह भी जांचेगा कि क्या सरकार द्वारा प्रस्तावित नई जगह इन साढ़े आठ लाख किताबों, दुर्लभ पांडुलिपियों और वहां आने वाले पाठकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से सुसज्जित और सुरक्षित है या नहीं। इस न्यायिक हस्तक्षेप के बाद अब यह उम्मीद बंध गई है कि लाइब्रेरी के स्थानांतरण की प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और वैज्ञानिक तरीकों से होगी, जिससे इसकी एक-एक पुरानी प्रति और ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित बचे रहें।

भविष्य की चुनौतियां और अकादमिक जगत की उम्मीदें

इस पूरी प्रक्रिया ने इस बात को फिर से रेखांकित कर दिया है कि आधुनिकीकरण और विकास के पहिये के नीचे देश की प्राचीन और सांस्कृतिक विरासत को कुचला नहीं जाना चाहिए। आज जब डिजिटल युग में भी भौतिक और ऐतिहासिक पुस्तकों का अपना एक अलग और अपरिवर्तनीय महत्व है, तो सेंट्रल सेक्रेटेरियट लाइब्रेरी जैसी संस्थाओं का संरक्षण और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है। देश भर के इतिहासकारों, लेखकों, वकीलों और शिक्षाविदों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट की इस महत्वपूर्ण सुनवाई पर टिकी हुई हैं। लोगों को पूरी उम्मीद है कि अदालत के मार्गदर्शन में एक ऐसा ठोस समाधान निकलेगा जिससे सेंट्रल विस्टा का आधुनिक स्वरूप भी निखर कर सामने आएगा और यह 135 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर भी पूरी शान के साथ आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बनी रहेगी।