India Protest Rules & Supreme Court Guidelines: क्या बिना पुलिस अनुमति के निकाला जा सकता है संसद मार्च? जानिए भारत में विरोध-प्रदर्शन को लेकर संविधान और सुप्रीम कोर्ट के कड़े नियम
संसद के सत्रों या किसी बड़े मुद्दे के दौरान अक्सर राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा 'संसद मार्च' (Parliament March) का आह्वान किया जाता है। हालांकि, ऐसी घोषणाओं के तुरंत बाद पुलिस प्रशासन क्षेत्र में बीएनएसएस (BNSS) की धारा 163 (पूर्व में आईपीसी/सीआरपीसी की धारा 144) लागू कर देता है और धारा-223 के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत के नागरिक बिना पूर्व अनुमति के सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं? एक रिपोर्टर के नजरिए से देखें तो भारतीय संविधान जहाँ नागरिकों को अपनी आवाज बुलंद करने का अधिकार देता है, वहीं सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के कई ऐतिहासिक फैसलों ने इस अधिकार की सीमाएं और नियम तय किए हैं।
संविधान क्या कहता है: अधिकार और उसकी सीमाएं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) स्वतंत्रता से अभिव्यक्ति और अनुच्छेद 19(1)(b) बिना हथियारों के शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने का मौलिक अधिकार (Fundamental Right) प्रदान करता है:
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असीमित अधिकार नहीं: यह अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत राज्य को लोक व्यवस्था (Public Order), देश की संप्रभुता और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए इस पर 'युक्तियुक्त प्रतिबंध' (Reasonable Restrictions) लगाने का पूरा अधिकार है।
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हिंसा की कोई जगह नहीं: यदि प्रदर्शन हिंसक होता है या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचता है, तो वह मौलिक अधिकार के दायरे से तुरंत बाहर हो जाता है।
क्या पुलिस की इजाजत लेना अनिवार्य है?
हां, भारत में किसी भी सार्वजनिक स्थल, सड़क या सरकारी भवन के आसपास जुलूस, रैली या धरना आयोजित करने के लिए स्थानीय पुलिस से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC/Permission) लेना कानूनी रूप से अनिवार्य है:
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नो-प्रोटेस्ट जोन (Zero Tolerance Zone): लुटियंस दिल्ली, संसद भवन परिसर, राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास के आसपास का क्षेत्र सुरक्षा के लिहाज से 'हाई-सिक्योरिटी जोन' घोषित रहता है। यहाँ बिना अनुमति कोई भी सभा पूरी तरह प्रतिबंधित होती है।
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तय स्थल (Designated Spot): सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार, राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर (Jantar Mantar) या रामलीला मैदान जैसे केवल तय स्थलों पर ही अनुमति मिलने के बाद शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के 3 सबसे ऐतिहासिक फैसले जो तय करते हैं नियम
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जंतर-मंतर फैसला (2018): सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर लगे प्रतिबंध को हटाते हुए कहा था कि प्रदर्शन करना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन नागरिकों के शांतिपूर्ण जीवन और प्रदर्शनकारियों के अधिकार के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
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शाहीन बाग फैसला (2020): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट फैसला सुनाया था कि असंतोष व्यक्त करने के लिए सार्वजनिक सड़कों या रास्तों का अनिश्चितकाल के लिए घेराव या कब्जा (Indefinite Occupation) नहीं किया जा सकता। यात्रियों और आम जनता की आवाजाही का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
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ताजा टिप्पणी (2026): हालिया सुनवाई में शीर्ष अदालत ने दोहराया है कि 'शांतिपूर्ण विरोध सबका अधिकार है, लेकिन यह आम जनता को परेशान करने या कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगाड़ने की सीमा तक नहीं जाना चाहिए।'
बिना अनुमति प्रदर्शन करने पर क्या हो सकती है कार्रवाई?
यदि कोई समूह बिना अनुमति के 'संसद मार्च' या सड़क जाम करने की कोशिश करता है, तो प्रशासन को निम्नलिखित कार्रवाई का अधिकार है:
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गैर-कानूनी सभा (Unlawful Assembly): भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत बिना अनुमति एकत्र होने वाली भीड़ को गैर-कानूनी घोषित कर पुलिस उन्हें हिरासत में ले सकती है।
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सरकारी काम में बाधा और प्रिवेंटिव डिटेंशन: धारा 223 (सरकारी आदेश के उल्लंघन) के तहत एफआईआर दर्ज की जा सकती है और आयोजकों को एहतियातन हिरासत (Preventive Detention) में लिया जा सकता है।