केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने दिया यह तीखा और विवादित बयान
भारतीय राजनीति और न्यायपालिका के गलियारों में इन दिनों केंद्रीय जांच एजेंसियों—विशेषकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और प्रवर्तन निदेशालय (ED)—की शक्तियों और उनके बेजा इस्तेमाल को लेकर बहस अपने चरम पर है। देश के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने एक बार फिर से जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर कड़ा प्रहार करते हुए एक बेहद तीखा और चर्चित बयान दिया है। उन्होंने अपने हालिया बयान में सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2013 में सीबीआई के लिए इस्तेमाल की गई ऐतिहासिक टिप्पणी 'पिंजरे में बंद तोता' को आगे बढ़ाते हुए कहा है कि अब यह तोता केवल पिंजरे में बंद नहीं रहा, बल्कि समय के साथ यह एक खतरनाक और आक्रामक 'पिटबुल' कुत्ते का रूप ले चुका है जिसे सरकार अपने राजनीतिक विरोधियों को नोंचने के लिए छोड़ देती है। चिदंबरम का यह बयान देश के राजनीतिक हलकों में आग की तरह फैल गया है और इस पर पक्ष तथा विपक्ष के नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी का दौर शुरू हो गया है। जब देश के सबसे अनुभवी राजनेताओं में से एक इस प्रकार की भाषा का उपयोग करते हैं, तो यह सीधे तौर पर हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं, स्वतंत्र जांच और न्याय प्रणाली की निष्पक्षता पर एक बहुत बड़ा और गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, जिस पर देश भर में गहन चिंतन किया जा रहा है।
सीबीआई और ईडी को और अधिक ताकतवर बनाने के सरकारी प्रयासों पर क्यों उठ रहे हैं गंभीर सवाल?
पिछले कुछ वर्षों से भारत में मनी लॉन्ड्रिंग, भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों से निपटने के नाम पर केंद्रीय जांच एजेंसियों (CBI, ED और IT) के दायरे और उनकी गिरफ्तारी तथा संपत्ति कुर्क करने की शक्तियों में भारी विस्तार किया गया है। सरकार का हमेशा से यह तर्क रहा है कि देश से भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने और आर्थिक अपराधियों को शिकंजे में कसने के लिए इन एजेंसियों के पास कड़े कानूनी हथियार होना बेहद जरूरी है ताकि कोई भी अपराधी कानून की गिरफ्त से बच न सके। हालांकि, इसके विपरीत विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग यह आरोप लगाता रहा है कि इन एजेंसियों को अत्यधिक और अनियंत्रित शक्तियां सौंप देने से लोकतंत्र की मूल भावना ही आहत हो रही है। पी. चिदंबरम और अन्य विपक्षी नेताओं का साफ तौर पर यह कहना है कि जब जांच एजेंसियों के हाथ में असीमित अधिकार आ जाते हैं, तो वे निष्पक्ष जांच करने के बजाय सत्ताधारी दल के राजनीतिक हितों को साधने का एक खुला साधन बन जाती हैं। इस प्रकार की व्यवस्था में न्याय और निष्पक्षता पीछे छूट जाती है और केवल प्रतिशोध की राजनीति का बोलबाला होने लगता है, जो किसी भी स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत माना जाता है।
'पिंजरे के तोते' से लेकर 'पिटबुल' तक के सफर के पीछे एजेंसियों की राजनीतिक स्वतंत्रता पर क्या असर पड़ा है?
साल 2013 में देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सीबीआई की स्वायत्तता पर सवाल उठाते हुए उसे 'पिंजरे में बंद तोता' की संज्ञा दी थी, जिसका सीधा मतलब यह था कि वह तोता तो है लेकिन पिंजरे यानी सरकार के इशारों पर ही बोलता है। अब सालों बाद पी. चिदंबरम ने उस रूपक को अपग्रेड करते हुए इसे 'पिटबुल' की संज्ञा दी है, जिसका अर्थ है कि अब यह एजेंसी केवल इशारों पर बोलने वाली नहीं रही, बल्कि अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर किसी पर भी झपटने और उसे लहूलुहान करने की पूरी ताकत रखती है। विपक्षी नेताओं के खिलाफ लगातार हो रही छापेमारी, गिरफ्तारियों और लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के बिना जेलों में महीनों तक सड़ने की घटनाओं ने इस बयान को एक प्रकार से सच्चाई का रूप दे दिया है। देश के कई नामी गिरामी वकीलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस बात की वकालत की है कि जब तक जांच एजेंसियों को किसी भी प्रकार के राजनीतिक नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त करके एक स्वतंत्र स्वायत्त आयोग (Independent Commission) के अधीन नहीं लाया जाता, तब तक आम जनता का न्याय व्यवस्था से भरोसा उठना लाजमी है। लोकतंत्र में पुलिस और जांच एजेंसियों का काम अपराध की निष्पक्ष जांच करना होना चाहिए, न कि किसी खास राजनीतिक दल के वैचारिक या चुनावी दुश्मनों को ठिकाने लगाने का हथियार बनना।
देश के आर्थिक विकास, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और लोकतंत्र की साख के बीच संतुलन कैसे बनेगा?
एक तरफ जहां सरकार यह दावा करती है कि देश की अर्थव्यवस्था को पारदर्शी बनाने और काले धन पर नकेल कसने के लिए कड़े वित्तीय कानूनों और शक्तिशाली एजेंसियों का होना अनिवार्य है, वहीं दूसरी तरफ इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन शक्तियों का दुरुपयोग लोकतांत्रिक मूल्यों को दीमक की तरह चाट रहा है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश में दुनिया भर के निवेशकों की निगाहें इस बात पर टिकी रहती हैं कि यहां कानून का राज (Rule of Law) किस प्रकार से काम कर रहा है। यदि उद्योगपति, व्यापारी और आम नागरिक यह महसूस करने लगें कि केंद्रीय एजेंसियां किसी निष्पक्ष न्याय प्रक्रिया के तहत काम करने के बजाय राजनीतिक प्रतिशोध के तहत छापे मार रही हैं, तो इससे देश के कारोबारी माहौल और अंतरराष्ट्रीय छवि को भी भारी नुकसान पहुंच सकता है। पी. चिदंबरम का यह विरोध केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह इस बात की गंभीर चेतावनी है कि यदि समय रहते इन संवैधानिक और जांच संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता को बचाने के लिए कड़े नियम नहीं बनाए गए, तो आने वाले समय में लोकतंत्र की रूपरेखा पूरी तरह से बिगड़ जाएगी। देश के नागरिकों, बुद्धिजीवियों और न्यायपालिका को मिलकर इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हनन के बीच एक स्वस्थ संतुलन कैसे स्थापित किया जाए ताकि कानून का शिकंजा अपराधियों पर कसे, न कि निर्दोषों और राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर।