अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का करारा प्रहार

अमेरिका-पाकिस्तान रिश्तों पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर का करारा प्रहार

भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने वैश्विक पटल पर एक बार फिर आतंकवाद और दोहरे मापदंडों को लेकर बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। संयुक्त राष्ट्र दिवस के विशेष उपलक्ष्य में आयोजित 'चिन्मय अमृत महोत्सव ग्लोबल सम्मेलन' के मंच से बोलते हुए उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के उन ताकतों को आड़े हाथों लिया जो अपने संकीर्ण हितों के लिए आतंकवाद जैसे नासूर पर आंखें मूंद लेती हैं। विदेश मंत्री का यह तीखा बयान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के उस हालिया बयान के ठीक बाद सामने आया है, जिसमें रुबियो ने पाकिस्तान के साथ अमेरिका के राजनयिक और रणनीतिक संबंधों को बनाए रखने की खुली वकालत की थी। जयशंकर ने अपने संबोधन में साफ शब्दों में रेखांकित किया कि आतंकवाद को किसी भी परिस्थिति में राज्य-नीति के एक औजार या राजनयिक सौदेबाजी के साधन के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को आगाह करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि जब-जब आतंकवाद को नजरअंदाज कर अल्पकालिक राजनीतिक फायदे तलाशे गए हैं, तब-तब पूरी मानवता को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है।

आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस की अनदेखी और राजनीतिक नफा-नुकसान

डॉ. जयशंकर ने वैश्विक शांति और स्थिरता के समक्ष उपस्थित संकटों का सिलसिलेवार विश्लेषण करते हुए कहा कि आज की परस्पर जुड़ी दुनिया में आतंकवाद सबसे घातक और गंभीर चुनौती बनकर खड़ा है। इसे किसी भी तर्क, सिद्धांत अथवा मजबूरी की आड़ लेकर कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता। विदेश मंत्री ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आतंकवाद जैसी अंतरराष्ट्रीय बुराई आज भी इसलिए फल-फूल रही है क्योंकि वैश्विक मंच पर सभी राष्ट्र वास्तविक अर्थों में इसके प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की नीति नहीं अपनाते। हालांकि उन्होंने अपने संबोधन में सीधे तौर पर किसी एक मुल्क का नाम लेने से परहेज किया, लेकिन उनके बयानों की दिशा और संदर्भ पूरी तरह स्पष्ट थे कि उनका इशारा सीमा पार से आतंकवाद को खाद-पानी देने वाले पाकिस्तान और उसे शह देने वाले पश्चिमी रुख की तरफ था। जयशंकर ने दो टूक शब्दों में कहा कि इतिहास से कड़वे सबक सीखने के बावजूद दुर्भाग्य से कुछ राष्ट्र आज भी अपने पुराने ढर्रे पर चलते हुए संकीर्ण राजनीतिक नफा-नुकसान और सामरिक हिसाब-किताब को नैतिकता और वैश्विक सुरक्षा से ऊपर रख रहे हैं। उन्होंने आह्वान किया कि जब तक सभी देश एकजुट होकर आतंकवाद के हर स्वरूप और उसकी जड़ों पर निर्णायक प्रहार नहीं करेंगे, तब तक एक सुरक्षित विश्व की कल्पना अधूरी ही रहेगी।

मार्को रुबियो की परमाणु दलील और ईरान के साथ तुलना का मामला

इस पूरे कूटनीतिक विवाद की पृष्ठभूमि तब तैयार हुई जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक अंतरराष्ट्रीय टेलीविजन चैनल को दिए साक्षात्कार में वाशिंगटन और इस्लामाबाद के मौजूदा रिश्तों का जोरदार बचाव किया। रुबियो ने अपनी दलील पेश करते हुए कहा था कि अमेरिका के लिए उन राष्ट्रों के साथ भी लगातार बातचीत और संवाद बनाए रखना बेहद जरूरी है, जिनके साथ उसके बुनियादी वैचारिक मतभेद हैं। रुबियो ने तर्क दिया कि चूंकि पाकिस्तान एक परमाणु हथियार संपन्न देश है और उसकी भौगोलिक स्थिति बेहद संवेदनशील है, इसलिए अमेरिका उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग नहीं छोड़ सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री ने इसकी तुलना भारत और ईरान के संबंधों से करते हुए कहा कि जिस तरह नई दिल्ली अपनी ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक हितों के मद्देनजर तेहरान के नेतृत्व के साथ रिश्ते कायम रखती है, ठीक उसी तरह अमेरिका को भी पाकिस्तान के साथ संवाद जारी रखना पड़ता है। रुबियो का दावा था कि अगर अमेरिका पाकिस्तान के साथ वार्ता की मेज पर मौजूद रहता है, तो वह उन सुरक्षा चिंताओं को नियंत्रित करने में मददगार साबित हो सकता है जिन्हें लेकर भारत हमेशा आशंकित रहता है। साथ ही रुबियो ने व्यापार, उन्नत तकनीक और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को 21वीं सदी का निर्णायक स्तंभ भी बताया था।

वैश्विक युद्धों की मार और शांति बहाली में भारत का नेतृत्व

विदेश मंत्री जयशंकर ने अपने व्याख्यान में केवल आतंकवाद तक ही अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने वर्तमान में दुनिया के अलग-अलग कोनों में चल रहे भयंकर सैन्य संघर्षों पर भी गंभीर मंथन साझा किया। पूर्वी यूरोप में चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी भीषण तनाव का विशेष उल्लेख करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि दुनिया के किसी भी कोने में अगर युद्ध भड़कता है, तो वह समूची धरती की शांति और आर्थिक व्यवस्था के लिए सीधा खतरा पैदा करता है। उन्होंने रेखांकित किया कि इन भू-राजनीतिक संघर्षों का सर्वाधिक दुष्प्रभाव उन निर्दोष समाजों, उभरती अर्थव्यवस्थाओं और आम नागरिकों पर पड़ रहा है, जिनका इस भू-राजनीतिक टकराव से दूर-दूर तक कोई सीधा लेना-देना नहीं है। ईंधन, खाद्य सामग्री और उर्वरकों की आपूर्ति शृंखला बाधित होने से विकासशील देशों पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। जयशंकर ने जोर देकर कहा कि भारत सदैव वार्ता, कूटनीति और शांति का पक्षधर रहा है और संकट के शांतिपूर्ण समाधान के लिए दुनिया के जिम्मेदार साझेदारों के साथ मिलकर ठोस कदम उठाने के लिए पूरी तरह तत्पर है।