नई दिल्ली में चीनी राजदूत का बड़ा बयान, जानिए द्विपक्षीय संबंधों पर क्या कही अहम बात

नई दिल्ली में चीनी राजदूत का बड़ा बयान, जानिए द्विपक्षीय संबंधों पर क्या कही अहम बात

भारत और चीन के बीच कूटनीतिक गलियारों से इस समय एक बेहद महत्वपूर्ण और कूटनीति के लिहाज से कड़े संदेश देने वाला बयान सामने आया है। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च-स्तरीय कार्यक्रम के दौरान भारत में तैनात चीन के राजदूत ने दोनों एशियाई महाशक्तियों के रिश्तों को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। चीनी राजदूत ने स्पष्ट रूप से यह रेखांकित किया है कि भारत और चीन को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन के रूप में देखने के बजाय एक-दूसरे के विकास में साझीदार और रणनीतिक सहयोगी के तौर पर देखना चाहिए। वैश्विक राजनीति और एशिया के भविष्य को तय करने वाले इस बयान के बाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से जमी कूटनीतिक बर्फ को पिघलाने और आपसी व्यापारिक तथा राजनीतिक संवाद को नए सिरे से पटरी पर लाने की सुगबुगाहट तेज हो गई है। आइए इस हाई-प्रोफाइल बयान, इसके भू-राजनीतिक निहितार्थों और दोनों देशों के रिश्तों के वर्तमान समीकरणों की पूरी और गहरी समीक्षा करते हैं।

चीनी राजदूत का यह बयान और कूटनीतिक मोर्चे पर इसके मायने

जब भी भारत और चीन के संबंधों की बात आती है, तो पिछले कुछ वर्षों के दौरान सीमा विवाद, सैन्य गतिरोध और व्यापारिक असंतुलन के कारण दोनों देशों के रिश्ते काफी तनावपूर्ण दौर से गुजरे हैं। ऐसे संवेदनशील समय में चीनी राजदूत का नई दिल्ली की धरती से यह कहना कि दोनों राष्ट्र प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार हैं, एक सोची-समझी कूटनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कूटनीतिक जानकारों का यह मानना है कि चीन अब यह भली-भांति समझ चुका है कि भारत जैसे विशाल बाजार और बढ़ती हुई वैश्विक आर्थिक महाशक्ति को नजरअंदाज करके बीजिंग अपने लंबे समय के आर्थिक हितों को सुरक्षित नहीं रख सकता। इस बयान के जरिए चीन ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूत करने और एशिया की शताब्दी को साकार करने के लिए दोनों पड़ोसी देशों का साथ मिलकर चलना अनिवार्य है।

सीमा विवाद और आपसी अविश्वास के बीच संवाद की अनिवार्यता

भले ही चीनी राजदूत ने साझेदारी और सहयोग की बड़ी-बड़ी बातें की हों, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि जब तक वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, तब तक दोनों देशों के बीच वास्तविक विश्वास कायम होना असंभव है। भारत सरकार ने हमेशा से अपनी विदेश नीति में यह स्पष्ट रुख अपनाया है कि सीमा पर शांति और सौहार्द ही द्विपक्षीय संबंधों के विकास की पहली शर्त है। पूर्वी लद्दाख के कुछ हिस्सों में चल रहे गतिरोध और सैन्य तनातनी को पूरी तरह से सुलझाने के लिए दोनों देशों के सैन्य कमांडरों और राजनयिकों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं। चीनी राजदूत के इस बयान के बाद यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि बीजिंग केवल जुबानी जमाखर्च कर रहा है या फिर जमीनी स्तर पर सैनिकों के पीछे हटने और आपसी विश्वास को बढ़ाने के लिए कोई ठोस और ईमानदार कदम उठाने को तैयार है।

आर्थिक interdependence और व्यापारिक मोर्चे पर दोनों देशों की मजबूरियां

भारत और चीन के रिश्ते केवल सामरिक और रणनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों अर्थव्यवस्थाएं कई मायनों में एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं। भारत को अपनी औद्योगिक वृद्धि, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए कई तरह के कच्चे माल, इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स और सोलर पैनल्स के आयात के लिए चीन पर निर्भर रहना पड़ता है। वहीं दूसरी ओर, चीनी कंपनियों और टेक दिग्गजों के लिए भारतीय बाजार मुनाफे का एक बहुत बड़ा जरिया है। हालांकि, भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए चीनी निवेश पर कड़ी नजर रखी है और घरेलू उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई (PLI) योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया है। इसके बावजूद, दोनों देशों के बीच अरबों डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार इस बात का गवाह है कि चाहकर भी दोनों देश पूरी तरह से एक-दूसरे से मुंह नहीं मोड़ सकते।

वैश्विक मंच पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और चीन का बदलता दृष्टिकोण

आज का भारत वर्ष 1962 वाला भारत नहीं है, बल्कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक आत्मविश्वासी और वैश्विक पटल पर स्वतंत्र निर्णय लेने वाली महाशक्ति के रूप में उभर चुका है। भारत ने अपनी विदेश नीति में 'मल्टी-अलाइनमेंट' यानी बहु-संरेखण की नीति को अपनाया है, जिसके तहत वह अमेरिका, यूरोप, रूस और जापान के साथ अपने सामरिक संबंधों को मजबूत करते हुए भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेता है। चीन इस बात को अच्छी तरह समझता है कि भारत को दबाया या नियंत्रित नहीं किया जा सकता, इसलिए अब कूटनीतिक भाषा में नरमी लाकर साझेदारी और संवाद की बात की जा रही है। यदि बीजिंग वास्तव में इन शब्दों के पीछे की नीول को साफ रखता है और अंतरराष्ट्रीय कानूनों तथा भारत की संप्रभुता का सम्मान करता है, तो आने वाले समय में एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल सकता है और दोनों देश मिलकर वैश्विक विकास में एक नया इतिहास रच सकते हैं।