कैबिनेट सचिव ने गिनाए नौकरशाहों के 12 अजीबोगरीब प्रकार
देश की प्रशासनिक व्यवस्था और बाबुओं की कार्यशैली को लेकर अक्सर आम आदमी से लेकर राजनीतिक गलियारों तक तमाम तरह की चर्चाएं होती रहती हैं। भारतीय प्रशासनिक सेवा और सरकारी तंत्र किस तरह से काम करता है, इसके तौर-तरीके हमेशा से ही एक पहेली रहे हैं। हाल ही में देश के कैबिनेट सचिव ने नौकरशाही के भीतर चल रही कार्यसंस्कृति पर एक बेहद दिलचस्प, तीखा और सच्चाई से भरा हुआ बयान दिया है। उन्होंने प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली का खुलकर कच्चा चिट्ठा खोलते हुए नौकरशाहों और अधिकारियों के कुल 12 अलग-अलग प्रकारों या श्रेणियों को सबके सामने उजागर किया है। सरकार के शीर्ष प्रशासनिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा इस तरह से बाबुओं की कार्यशैली का वर्गीकरण करना यह बताता है कि शासन और प्रशासन के भीतर फाइलों के मूवमेंट से लेकर बैठकों के दौर तक किस प्रकार की मानसिकताओं का सामना करना पड़ता है। यह विश्लेषण न केवल प्रशासनिक सुधारों की जरूरत को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी बताता है कि सिस्टम को चलाने वाले ये अधिकारी खुद कितने अलग-अलग सांचों में ढले हुए हैं।
फाइलों को दबाने वाले और कागजों के ढेर में उलझाने वाले अफसर
कैबिनेट सचिव द्वारा गिनाए गए इन 12 प्रकारों में सबसे पहला और आम सामना होने वाला प्रकार उन अधिकारियों का है जिन्हें फाइलें दबाने या लटकाने में महारत हासिल होती है। सरकारी दफ्तरों में अक्सर यह देखने को मिलता है कि किसी महत्वपूर्ण योजना या आम जनता से जुड़े काम की फाइल जब ऐसे अधिकारियों की टेबल पर पहुंचती है, तो वह अनिश्चित काल के लिए गायब हो जाती है। इन्हें फाइलों पर कुंडली मारकर बैठने वाला कहा जा सकता है, जो नियमों की अनावश्यक पेचीदगियों और लालफीताशाही (Red Tapism) का हवाला देकर हर काम में जानबूझकर अंगा अड़ाते हैं। इन अफसरों की कार्यशैली के कारण फाइलें एक टेबल से दूसरी टेबल तक महीनों और कभी-कभी सालों तक चक्कर काटती रहती हैं। इसके उलट, इसी श्रेणी में कुछ ऐसे अधिकारी भी होते हैं जो कागजी कार्रवाई को इतना जटिल बना देते हैं कि साधारण सा काम भी एक बड़ी कानूनी उलझन बन जाता है। जनता के विकास कार्यों और फाइलों के इस तरह से दबाए जाने की प्रवृत्ति पर कैबिनेट सचिव की यह टिप्पणी प्रशासनिक तंत्र के उस गहरे नासूर पर वार करती है जिससे हर आम नागरिक और सरकार खुद परेशान रहती है।
देर रात मीटिंग बुलाने वाले और वर्कहॉलिक अफसरों का आतंक
ब्यूरोक्रेटिक कल्चर का दूसरा सबसे चर्चित और तनावपूर्ण पहलू उन अधिकारियों से जुड़ा है जो खुद को अत्यधिक कर्मठ या वर्कहॉलिक दिखाने के चक्कर में पूरे दफ्तर की शाम और रात का सुकून छीन लेते हैं। कैबिनेट सचिव ने ऐसे बाबुओं का भी जिक्र किया है जो ऑफिस का समय खत्म होने के ठीक बाद या फिर देर रात को अचानक अहम बैठकें बुलाने के शौकीन होते हैं। इन अधिकारियों को लगता है कि रात के वक्त या लंबी और अंतहीन बैठकों में फैसले लेने से वे अपनी कार्यकुशलता साबित कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह होती है कि इस तरह की अनुत्पादक बैठकों से मातहत कर्मचारियों और जूनियर अधिकारियों का मानसिक उत्पीड़न होता है। दफ्तर के काम के घंटों के बाद अचानक थोपे गए ये मीटिंग कल्चर और आदेश अधीनस्थों की निजी जिंदगी और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ते हैं। ऐसे अफसर खुद तो ऑफिस में रात गुजारते ही हैं, साथ ही अपने पूरे स्टाफ को भी बेवजह की कागजी कवायद और बैठकों में उलझाए रखते हैं, जिससे प्रशासनिक效率 सुधरने के बजाय और अधिक प्रभावित होती है।
चाटुकारिता से लेकर आदेशों का केवल दिखावा करने वाले बाबू
सरकारी व्यवस्था में कुछ ऐसे प्रशासनिक चेहरे भी होते हैं जो सिर्फ अपने वरिष्ठों को खुश करने और अपनी कुर्सी सुरक्षित रखने के लिए हर हथकंडा अपनाते हैं। कैबिनेट सचिव के वर्गीकरण में उन अधिकारियों का भी जिक्र है जो अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के बजाय केवल 'हां में हां' मिलाने की कला में माहिर होते हैं। इन्हें जमीनी हकीकत से कोई सरोकार नहीं होता, बल्कि उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि उनके सीनियर या मंत्री महोदय उनसे प्रसन्न रहें। इसके विपरीत, कुछ ऐसे भी अफसर होते हैं जो कागजों पर तो बड़े-बड़े लक्ष्य और योजनाएं तैयार कर देते हैं, लेकिन धरातल पर उनका क्रियान्वयन शून्य होता है। वे केवल मीटिंग्स में बड़ी-बड़ी बातें करने और पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन दिखाने में विश्वास रखते हैं। प्रशासनिक भाषा में इन्हें केवल दिखावा करने वाला या खोखले आंकड़ों का जाल बुनने वाला अधिकारी कहा जा सकता है। जनता की समस्याओं के समाधान से इनका दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता, और ये अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए हमेशा नए-नए बहाने और आंकड़े गढ़ते रहते हैं।
सकारात्मक बदलाव की आस और सुस्त पड़ चुके सिस्टम की हकीकत
कैबिनेट सचिव द्वारा नौकरशाहों के इन 12 अलग-अलग रूपों और उनकी कार्यसंस्कृति का यह पर्दाफाश इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश की प्रशासनिक व्यवस्था के भीतर आत्मમंथन का दौर शुरू हो चुका है। एक तरफ जहां कुछ अधिकारी अपनी सुस्ती, फाइलों को दबाने की आदत और लालफीताशाही के जरिए सिस्टम को पटरी से उतारते हैं, वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी समर्पित लोग हैं जो तमाम बाधाओं के बावजूद पूरी ईमानदारी से देश और जनता की सेवा में जुटे रहते हैं। लेकिन जब तक फाइलों को लटकाने वाले, देर रात बेवजह की मीटिंग्स थोपने वाले और चाटुकारिता को बढ़ावा देने वाले इन किरदारों पर नकेल नहीं कसी जाएगी, तब तक सरकारी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ आम जनता तक पहुंचना मुश्किल बना रहेगा। प्रशासनिक सुधारों की दिशा में यह बयान एक आईने की तरह है, जो यह बताता है कि बाबुओं की कार्यशैली में सुधार किए बिना देश की विकास यात्रा को गति देना असंभव है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस खुलासे के बाद प्रशासनिक अमला अपनी कार्यसंस्कृति में किस प्रकार के सकारात्मक और कड़े बदलाव लेकर आता है।