यमुना इवेंट केस में 'आर्ट ऑफ लिविंग' को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, NGT का फैसला रद्द; ₹5 करोड़ लौटाने का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने यमुना नदी के डूब क्षेत्र (Floodplains) में आयोजित 'विश्व संस्कृति महोत्सव 2016' से जुड़े मामले में आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की संस्था 'आर्ट ऑफ लिविंग' (AOL) को एक बड़ी कानूनी राहत दी है। शीर्ष अदालत ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के 2017 के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है, जिसमें संस्था को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का दोषी मानते हुए ₹5 करोड़ का पर्यावरण मुआवजा (Environmental Compensation) भरने का निर्देश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को आदेश दिया है कि वह संस्था द्वारा जमा कराई गई ₹5 करोड़ की पूरी राशि ब्याज सहित वापस करे।
सुप्रीम कोर्ट ने NGT की प्रक्रिया पर उठाए गंभीर सवाल
जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इस मामले पर फैसला सुनाते हुए एनजीटी के काम करने के तरीके और प्रक्रियात्मक खामियों को रेखांकित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि एनजीटी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति की अंतरिम सिफारिशों के आधार पर बिना किसी ठोस वैज्ञानिक मूल्यांकन और साक्ष्यों के ₹5 करोड़ की राशि तय करना कानूनी सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था। अदालत ने माना कि किसी भी संस्था पर वित्तीय या पर्यावरणीय दायित्व थोपने से पहले उचित वैज्ञानिक जांच और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है।
साल 2016 के 'विश्व संस्कृति महोत्सव' से जुड़ा है पूरा विवाद
यह पूरा विवाद मार्च 2016 में दिल्ली में यमुना नदी के तट पर आयोजित तीन दिवसीय 'विश्व संस्कृति महोत्सव' (World Culture Festival) से शुरू हुआ था। इस भव्य अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रम में देश-विदेश के लाखों लोगों ने भाग लिया था। हालांकि, आयोजन से पहले और बाद में पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने याचिकाएं दायर कर आरोप लगाया था कि नदी के संवेदनशील डूब क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर ढांचागत निर्माण और जनसमूह के जुटने से वहां के स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र, जलीय जीवों और भूजल पुनर्भरण क्षमता को अपूरणीय क्षति पहुंची है।
NGT का 2017 का आदेश और विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट
पर्यावरण कार्यकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए एनजीटी ने दिसंबर 2017 में फैसला सुनाया था। ट्रिब्यूनल ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए माना था कि कार्यक्रम के आयोजन से यमुना के फ्लडप्लेन को नुकसान हुआ है। एनजीटी ने आर्ट ऑफ लिविंग पर ₹5 करोड़ का अंतिम पर्यावरणीय जुर्माना लगाया था और निर्देश दिया था कि इस राशि का उपयोग डीडीए द्वारा यमुना तट के पुनरुद्धार और बायो-डाइवर्सिटी पार्क के विकास के लिए किया जाएगा। संस्था ने शुरू में विरोध जताने के बाद इस राशि को जमा करवा दिया था, लेकिन साथ ही एनजीटी के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
पर्यावरण मंजूरी और डीडीए की अनापत्ति का उल्लेख
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि कार्यक्रम के लिए संबंधित वैधानिक प्राधिकरणों से सभी आवश्यक अनुमतियां और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त किए गए थे। संस्था ने किसी भी तरह के पक्के निर्माण से इनकार किया था और कहा था कि आयोजन के बाद पूरे क्षेत्र को साफ करके मूल स्थिति में लौटा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पाया कि बिना किसी ठोस पर्यावरणीय क्षति आंकलन के लगाया गया जुर्माना टिकने योग्य नहीं है और डीडीए को यह रकम वापस करने का आदेश दिया।