105 साल के बुजुर्ग को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: 38 साल पुराने मामले में अदालत ने पूछा- क्या वो जिंदा हैं, क्यों न हमेशा के लिए रिहाई हो?

105 साल के बुजुर्ग को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत: 38 साल पुराने मामले में अदालत ने पूछा- क्या वो जिंदा हैं, क्यों न हमेशा के लिए रिहाई हो?

देश की सर्वोच्च अदालत ने न्याय प्रणाली में मानवीय संवेदनाओं और कैदियों की अत्यधिक उम्र के पहलू पर एक बार फिर बड़ा संदेश दिया है। लगभग 38 वर्ष पुराने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने जब 105 वर्ष के बुजुर्ग की उम्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया को देखा, तो गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए पूछा कि क्या वह व्यक्ति आज भी जीवित है और इतनी अधिक उम्र में जब व्यक्ति खुद दैनिक कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भर हो जाता है, तो उसे हमेशा के लिए जेल की सजा से मुक्त क्यों न कर दिया जाए।

निचली अदालत से शीर्ष अदालत तक खिंचती कानूनी प्रक्रिया

यह मामला करीब चार दशक पहले का है, जब संबंधित व्यक्ति के खिलाफ स्थानीय स्तर पर गंभीर धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ था। ट्रायल कोर्ट और उसके बाद उच्च न्यायालय (हाईकोर्ट) में वर्षों तक चले मुकदमे के बाद दोषी ठहराए जाने का फैसला आया था। इसके बाद अपील सुप्रीम कोर्ट पहुंची। दशकों तक फाइलों में दबे और लंबित मामलों के कारण जब तक अंतिम फैसला आता है, तब तक आरोपी या दोषी अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंच जाते हैं। इसी विसंगति को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा कि न्यायिक देरी के कारण बुजुर्ग कैदियों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो जाती है।

अति-वरिष्ठ कैदियों की स्थायी रिहाई और मानवीय अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर बल दिया कि 100 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को जेल में रखना न केवल जेल प्रशासन के लिए मेडिकल चुनौतियों का कारण बनता है, बल्कि यह कैदी के बुनियादी मानवाधिकारों से भी जुड़ा मसला है। अदालत ने संबंधित राज्य सरकार और अभियोजन पक्ष से कैदी की वर्तमान शारीरिक स्थिति, स्वास्थ्य और जीवन की स्थिति पर सटीक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के कड़े प्रावधानों के बीच भी संविधान का अनुच्छेद 21 मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार की गारंटी देता है।

न्याय प्रणाली में लंबित मुकदमों पर नए सिरे से चर्चा

इस फैसले और अदालत की तल्ख टिप्पणियों ने एक बार फिर भारतीय न्याय व्यवस्था में मामलों के निपटारे में लगने वाले समय पर बहस छेड़ दी है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कैदियों के लिए, जो 80 या 90 वर्ष से अधिक उम्र के हैं और जिन्होंने अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा काट लिया है, राज्यों को विशेष क्षमादान और रिहाई नीति (Remission Policy) के तहत त्वरित निर्णय लेने की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि किसी व्यक्ति को शताब्दी पार करने के बाद भी अदालतों के चक्कर न लगाने पड़ें।

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