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बंगाल चुनाव में हार के बाद TMC में महासंग्राम, विधायकों के बाद अब सांसदों की बारी, क्या ममता बनर्जी की पार्टी में होने जा रहा 

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर का अंदरूनी असंतोष अब एक बड़े राजनीतिक भूचाल में तब्दील हो चुका है। राज्य विधानसभा में पार्टी विधायकों की भारी टूट के बाद अब बगावत की यह चिंगारी देश की संसद यानी दिल्ली तक पहुंच गई है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा बेहद तेज है कि टीएमसी के कई असंतुष्ट सांसद लोकसभा और राज्यसभा में एक अलग विद्रोही गुट बनाने की फिराक में हैं। इस इनपुट्स ने टीएमसी आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी है। हालांकि, रविवार को पार्टी के शीर्ष नेताओं ने डैमेज कंट्रोल करते हुए दावा किया कि देश के कड़े दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के चलते संसद में इस तरह की किसी भी बगावत को अंजाम देना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है।

संसद में बगावत का गणित: क्या बागी जुटा पाएंगे 19 सांसदों का आंकड़ा?

मौजूदा लोकसभा समीकरणों की बात करें तो निचले सदन में तृणमूल कांग्रेस के कुल 28 सांसद हैं। दलबदल विरोधी कानून के तहत अपनी सदस्यता बचाते हुए पार्टी से अलग होने के लिए विद्रोही गुट को कम से कम दो-तिहाई यानी 19 लोकसभा सांसदों के भारी-भरकम समर्थन की जरूरत होगी। टीएमसी के वरिष्ठ पदाधिकारियों का तर्क है कि अगर बागी गुट किसी तरह यह जादुई आंकड़ा जुटा भी लेता है, तो भी वे संसद के भीतर एक स्वतंत्र समूह के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं कर सकते। कानूनन उन्हें किसी अन्य मौजूदा राजनीतिक दल में अपनी मर्जी से विलय (Merge) करना ही होगा। टीएमसी के एक शीर्ष नेता ने स्पष्ट किया कि भारतीय संसदीय कानून में अलग से कोई नया समूह बनाने का कोई प्रावधान ही नहीं है।

स्पीकर की भूमिका पर रार और 'INDIA' गठबंधन की बैठक से ध्यान भटकाने का आरोप

सियासी गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, असंतुष्ट सांसदों का एक समूह पिछले कई दिनों से संसद के दोनों सदनों में अन्य सहयोगियों का समर्थन जुटाने के लिए गुप्त बैठकें कर रहा है। चर्चा यह भी है कि जरूरी संख्याबल मिलते ही यह गुट लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के पास जाकर पार्टी के वर्तमान संसदीय नेता को बदलने की आधिकारिक अर्जी दे सकता है। हालांकि, टीएमसी नेतृत्व ने इस संभावना को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। पार्टी नेताओं का तर्क है कि संसदीय दल का नेता कौन होगा, यह फैसला संबंधित राजनीतिक दल करता है ना कि लोकसभा स्पीकर। टीएमसी ने इसे विपक्षी एकजुटता यानी सोमवार को होने वाली 'INDIA' ब्लॉक की महत्वपूर्ण बैठक से मीडिया का ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है।

विधानसभा मॉडल बनाम 'आम आदमी पार्टी' (AAP) वाला खतरनाक फॉर्मूला

इस भीषण अंदरूनी खींचतान के बीच, टीएमसी के भीतर इस वक्त दो बड़े राजनीतिक उदाहरणों की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है:

  • पहला है 'विधानसभा मॉडल': जहां हाल ही में टीएमसी के 80 में से 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बगावत कर पार्टी से खुद को अलग कर लिया और सदन में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल कर लिया था।

  • दूसरा है 'AAP मॉडल': जिसमें राघव चड्ढा समेत कुछ राज्यसभा सांसदों ने दलबदल कानून की बारीकियों का सहारा लेकर कथित तौर पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय का रास्ता चुना था। टीएमसी के रणनीतिकार मान रहे हैं कि चाहे मॉडल जो भी हो, दोनों ही स्थितियों में कानूनी प्रक्रिया बेहद लंबी और पेचीदा है, और चूंकि संसद का मानसून सत्र अभी काफी दूर है, इसलिए नेतृत्व के पास इस डैमेज को कंट्रोल करने का पूरा मौका है।

दिल्ली में ममता और अभिषेक बनर्जी का डेरा, बागियों को साधने की कवायद तेज

पश्चिम बंगाल में सांगठनिक स्तर पर मचे इस हाहाकार को देखते हुए ममता बनर्जी और उनके भतीजे व पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी पूरी तरह अलर्ट मोड पर आ गए हैं। अभिषेक बनर्जी शनिवार को ही दिल्ली पहुंच गए थे, वहीं पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी भी 'INDIA' गठबंधन की बैठक में शामिल होने के बहाने रविवार को राष्ट्रीय राजधानी पहुंच चुकी हैं। बताया जा रहा है कि दोनों नेता दिल्ली में मौजूद अपनी पार्टी के सभी लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के साथ वन-टू-वन बैठक करेंगे ताकि बगावत के किसी भी संभावित खतरे को समय रहते कुचला जा सके।

अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व शैली पर उठे गंभीर सवाल

टीएमसी के बागी विधायकों के उपनेता संदीपन साहा के हालिया बयानों ने आग में घी डालने का काम किया है। साहा ने खुला दावा किया है कि जो खेला कुछ दिनों पहले बंगाल विधानसभा के भीतर हुआ था, ठीक वैसी ही पटकथा अब संसद के भीतर भी लिखी जा रही है। विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस के कई सीनियर और कद्दावर नेताओं ने अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और उनके फैसलों की खुलकर आलोचना शुरू कर दी है, जिससे पार्टी दो फाड़ होने की कगार पर खड़ी दिखाई दे रही है। फिलहाल लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसदों वाली टीएमसी के सामने अपने इस कुनबे को बिखरने से बचाने की सबसे बड़ी चुनौती है।

 

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