Modi-Trump Deal : मोदी-ट्रंप की दोस्ती से चीन में हड़कंप ट्रंप के टैरिफ प्लान पर ड्रैगन का बड़ा बयान

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News India Live, Digital Desk: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुए हालिया समझौते ने वैश्विक व्यापार के समीकरण बदल दिए हैं। ट्रंप ने भारत के लिए टैरिफ घटाकर 18% करने का ऐलान किया है, जबकि चीन के लिए यह दरें काफी ऊंची रखी गई हैं। इस डील के बाद चीन ने अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है, जिसमें 'नाराजगी' और 'चिंता' साफ झलक रही है। चीन का मानना है कि यह समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि उसे आर्थिक रूप से घेरने की एक बड़ी साजिश है।

चीन की प्रतिक्रिया: "अमेरिका की स्वार्थी कूटनीति"

चीन के विदेश मंत्रालय और वहां के सरकारी मीडिया 'ग्लोबल टाइम्स' ने इस डील को लेकर तीखे तेवर दिखाए हैं। चीन ने आरोप लगाया है कि अमेरिका 'जीरो-सम गेम' खेल रहा है। बीजिंग का तर्क है कि भारत को दी गई रियायतें वास्तव में चीन के वैश्विक निर्यात को चोट पहुँचाने के लिए दी गई हैं। चीनी विशेषज्ञों का कहना है कि वाशिंगटन "फूट डालो और राज करो" की नीति के तहत एशियाई शक्तियों के बीच दरार पैदा कर रहा है।

रूसी तेल पर ट्रंप के दावे से भड़का ड्रैगन

ट्रंप ने दावा किया था कि इस समझौते के बाद भारत अब रूस से तेल नहीं खरीदेगा। इस पर चीन ने भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) पर सवाल उठाए हैं। चीन का कहना है कि अमेरिका, भारत पर अपनी नीतियां थोप रहा है। बीजिंग के अनुसार, किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वह किससे व्यापार करेगा, और अमेरिका का हस्तक्षेप 'जबरदस्ती वाली कूटनीति' है।

टैरिफ का गणित: भारत 'इन', चीन 'आउट'

चीनी अर्थशास्त्रियों को सबसे ज्यादा चिंता व्यापारिक घाटे की है। 2026 के आंकड़ों के अनुसार स्थिति कुछ ऐसी है:

देशप्रभावी टैरिफ (US द्वारा)आर्थिक प्रभाव
भारत18%भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बड़ी बढ़त
चीन35%+ट्रेड वॉर के कारण चीनी माल महंगा और कम प्रतिस्पर्धी

क्या भारत के लिए यह 'मास्टरस्ट्रोक' है?

जहाँ चीन इसे एक 'अस्थिर सौदा' बता रहा है, वहीं वैश्विक बाजार इसे भारत की बड़ी जीत मान रहे हैं। भारत ने अमेरिकी उत्पादों के लिए अपने बाजार खोलने का जो वादा किया है, उसके बदले में उसे 'मेड इन इंडिया' उत्पादों के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार (USA) सस्ते दामों पर मिल गया है। चीन को डर है कि अब एप्पल, टेस्ला और अन्य बड़ी टेक कंपनियां अपना पूरा बेस चीन से हटाकर भारत में शिफ्ट कर सकती हैं।