Mahagathbandhan : एग्जिट पोल का खेल और बिहार का नतीजा, जब टीवी पर तेजस्वी जीते और असल में नीतीश
News India Live, Digital Desk: चुनाव खत्म होते ही हम सबकी नजरें टीवी स्क्रीन पर चिपक जाती हैं. इंतजार होता है एग्जिट पोल्स का. ये एग्जिट पोल हमें एक झलक दिखाते हैं कि हवा किस तरफ बह रही है, ऊंट किस करवट बैठेगा. नेताओं की धड़कनें बढ़ जाती हैं और कार्यकर्ता लड्डू के ऑर्डर देने की तैयारी करने लगते हैं. लेकिन क्या इन एग्जिट पोल्स पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सकता है? अगर आपको इसका जवाब चाहिए, तो चलिए आपको साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में वापस ले चलते हैं.
जब हर एग्जिट पोल ने तेजस्वी को बना दिया था मुख्यमंत्री
साल 2020 का बिहार चुनाव... माहौल एकदम गर्म था. एक तरफ थे मौजूदा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और एनडीए गठबंधन, और दूसरी तरफ थे तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन. चुनाव खत्म होते ही जैसे ही एग्जिट पोल्स के आंकड़े आने शुरू हुए, लगभग हर चैनल और हर एजेंसी ने एक ही बात कही - "इस बार तेजस्वी सरकार!"
किसी ने महागठबंधन को 120 सीटें दीं, तो किसी ने 130, यहां तक कि कुछ ने तो 140 सीटों के प्रचंड बहुमत का भी अनुमान लगा दिया था. टीवी पर एक्सपर्ट्स तेजस्वी यादव के मुख्यमंत्री बनने की चुनौतियां और अवसर गिनाने लगे थे. आरजेडी के दफ्तरों के बाहर जश्न का माहौल बनना शुरू हो गया था. ऐसा लग रहा था कि अब तो बस नतीजों की औपचारिक घोषणा बाकी है.
...और फिर आया 'नतीजों का ट्विस्ट'
आखिरकार, वोटों की गिनती का दिन आया. सुबह से ही कांटे की टक्कर चल रही थी. जो एग्जिट पोल एकतरफा महागठबंधन की जीत दिखा रहे थे, असल नतीजे उसके बिल्कुल उलट जा रहे थे. कभी एनडीए आगे होता, तो कभी महागठबंधन. पूरा दिन सांसें अटकी रहीं.
और जब देर रात तक अंतिम नतीजे आए, तो कहानी पूरी तरह से पलट चुकी थी.
- एग्जिट पोल का अनुमान (औसत): महागठबंधन को 125-135 सीटें, एनडीए को 100-110 सीटें.
- असली नतीजा: एनडीए ने 125 सीटों के साथ बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया और सरकार बनाई. वहीं, महागठबंधन 110 सीटों पर ही सिमट कर रह गया.
जो तेजस्वी यादव टीवी पर मुख्यमंत्री बन चुके थे, वे असल में विपक्ष में बैठे. और जिन नीतीश कुमार की विदाई तय मानी जा रही थी, उन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
क्यों फेल हो जाता है एग्जिट पोल का गणित?
एग्जिट पोल कोई हवा-हवाई बातें नहीं होतीं, ये हजारों मतदाताओं से बात करके तैयार की जाती हैं. लेकिन फिर भी ये गलत साबित हो जाते हैं, खासकर बिहार जैसे राज्य में जहां का सामाजिक और जातीय समीकरण बहुत जटिल है. कई बार वोटर, खासकर महिलाएं या किसी खास जाति के लोग, खुलकर नहीं बताते कि उन्होंने किसे वोट दिया है. कभी-कभी सैंपल साइज छोटा होने से भी नतीजे गड़बड़ा जाते हैं.
इसलिए अगली बार जब आप एग्जिट पोल देखें, तो उसे एक संकेत की तरह ही लें. क्योंकि असली नतीजा तो वही होता है, जो EVM मशीन से निकलता है. असली 'मैन ऑफ द मैच' तो वो वोटर है, जो चुपचाप बटन दबाकर 5 साल का फैसला सुना देता है.