Madras High Court : लोकतंत्र या गुंडागर्दी? मंदिर दरगाह विवाद पर फैसला सुनाने वाले जज को निशाना बनाना पड़ा महंगा
News India Live, Digital Desk : सोशल मीडिया के दौर में लोगों को लगता है कि उन्हें कुछ भी बोलने की आजादी है। मोबाइल उठाया, कैमरा ऑन किया और किसी को भी बुरा-भला कह दिया। नेताओं को तो छोड़िए, आजकल लोग जजों (Judges) को भी नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन मद्रास हाई कोर्ट ने आज साफ कर दिया है कि "अब बहुत हो गया!"
तमिलनाडु में एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा चल रहा है तिरुपरंकुंद्रम पहाड़ी (Thiruparankundram Hill) विवाद। यहां कार्तिकई दीपम (Karthigai Deepam) जलाने को लेकर हिंदू पक्ष और वहां मौजूद दरगाह के बीच एक विवाद था। मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में इस पर एक फैसला सुनाया था, जिसमें दीप जलाने की अनुमति तो दी गई थी, लेकिन कुछ शर्तों के साथ।
क्यों नाराज हुआ कोर्ट?
अदालत का काम है दोनों पक्षों को सुनकर फैसला देना। अगर किसी को फैसला पसंद नहीं आता, तो उसके पास ऊपरी अदालत में अपील करने का रास्ता होता है। लेकिन कुछ लोगों ने, खास तौर पर कुछ यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने सारी हदें पार कर दीं।
खबर के मुताबिक, जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन (Justice G.R. Swaminathan) और अन्य जजों पर सोशल मीडिया पर निजी हमले (Personal Attacks) किए गए। उन पर पक्षपाती होने और न जाने क्या-क्या आरोप लगाए गए। जातिगत टिप्पणियां तक की गईं।
कोर्ट ने क्या कहा? (यह जानना जरूरी है)
आज जब मामले की सुनवाई हुई, तो कोर्ट का गुस्सा देखने लायक था। जजों ने सख्त लहजे में कहा:आलोचना फैसले की हो सकती है, जज की नहीं। हमारे सब्र का इम्तिहान मत लो। अगर आप जज के चरित्र पर उंगली उठाएंगे, तो हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे।"
कोर्ट ने दो यूट्यूब चैनलों (चे मुजीब और अन्य) के खिलाफ स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए अवमानना (Contempt) की कार्रवाई शुरू कर दी है। कोर्ट ने पुलिस और सरकार को आदेश दिया है कि ऐसे अपमानजनक वीडियो तुरंत हटाए जाएं।
क्या है 'लक्ष्मण रेखा'?
कोर्ट ने एक बहुत बड़ी बात समझाई लोकतंत्र में आपको बोलने का हक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आप न्यायपालिका (Judiciary) को बदनाम करें। एक जज शपथ लेकर कुर्सी पर बैठता है। अगर आप सोशल मीडिया पर बिना सबूत के उन्हें 'भ्रष्ट' या 'जातिवादी' कहेंगे, तो इससे पूरी न्याय व्यवस्था पर से जनता का भरोसा उठ जाएगा।
आम जनता के लिए सबक
दोस्तों, हम अक्सर भावनाओं में बहकर वाट्सऐप ग्रुप्स या फेसबुक पर कोर्ट के फैसलों पर उल्टा-सीधा लिख देते हैं। यह घटना एक चेतावनी है। कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। अपनी राय रखिए, लेकिन भाषा की मर्यादा मत भूलिए। वरना "अदालत की अवमानना" का नोटिस घर आते देर नहीं लगेगी।
कानून का सम्मान करें, यही एक सभ्य नागरिक की पहचान है।