Krishna Leela : श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाने के लिए सबसे कमजोर उंगली ही क्यों चुनी? छिपा है सफलता का बड़ा राज

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News India Live, Digital Desk: सनातन धर्म में भगवान श्री कृष्ण की 'गोवर्धन लीला' अहंकार के विनाश और प्रकृति की रक्षा का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। हम सभी जानते हैं कि इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए कन्हैया ने सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठाए रखा था। लेकिन क्या आपने कभी सोचा कि ब्रह्मांड के स्वामी ने पर्वत उठाने के लिए सबसे शक्तिशाली उंगली के बजाय अपने बाएं हाथ की 'कनिष्ठा' (सबसे छोटी उंगली) का ही चुनाव क्यों किया? इस पौराणिक कथा के पीछे एक ऐसा अद्भुत तर्क छिपा है, जो आज के दौर में हर इंसान के लिए प्रेरणा बन सकता है।

क्यों चुनी सबसे छोटी उंगली? अहंकार पर अंतिम प्रहार

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण चाहते तो पर्वत को एक इशारे से हवा में उड़ा सकते थे, लेकिन उन्होंने सबसे छोटी उंगली का सहारा लिया। इसके पीछे मुख्य कारण 'अहंकार का मर्दन' था।

इंद्र का गर्व: देवराज इंद्र को अपनी शक्ति पर बहुत घमंड था। कृष्ण ने सबसे कमजोर उंगली से पर्वत उठाकर यह संदेश दिया कि जिसे इंद्र अपनी पूरी शक्ति (मूसलाधार बारिश) से डरा रहे हैं, उसे हराने के लिए ईश्वर की एक छोटी उंगली ही काफी है।

भक्तों का साथ: कृष्ण ने पर्वत उठाते समय ग्वाल-बालों से कहा कि वे अपनी लाठियां लगा दें। वह दिखाना चाहते थे कि जब सब मिलकर प्रयास करते हैं, तो भगवान केवल एक 'सहारा' बनकर भी बड़े से बड़ा संकट टाल देते हैं।

बाएं हाथ का रहस्य: प्रेम और कोमलता का प्रतीक

शास्त्रों में दाएं हाथ को पुरुषार्थ और बाएं हाथ को प्रेम व करुणा का प्रतीक माना गया है। श्री कृष्ण 'प्रेम' के अवतार हैं।

ब्रजवासियों के प्रति वात्सल्य: कन्हैया ने बाएं हाथ का इस्तेमाल इसलिए किया क्योंकि वह अपने दाहिने हाथ से मुरली बजाकर और ब्रजवासियों को अभयदान देकर उनके डर को दूर करना चाहते थे।

बल नहीं, भाव प्रधान: कृष्ण ने सिद्ध किया कि भारी से भारी बोझ उठाने के लिए शारीरिक बल से ज्यादा 'संकल्प' और 'प्रेम' की आवश्यकता होती है।

कनिष्ठा उंगली का मनोवैज्ञानिक महत्व

आधुनिक दर्शन के अनुसार, हाथ की सबसे छोटी उंगली को सबसे उपेक्षित माना जाता है। कृष्ण ने इसे चुनकर समाज को सिखाया कि:

दुनिया में कोई भी छोटा या कमजोर नहीं है।

जिसे समाज 'सबसे छोटा' समझकर अनदेखा करता है, वह भी ईश्वर का साथ पाकर 'गोवर्धन' जैसा विशाल पर्वत उठाने की क्षमता रखता है।

7 दिनों तक भूखे रहे 'छप्पन भोग' के स्वामी

कथा के अनुसार, कृष्ण सात दिनों तक पर्वत उठाए खड़े रहे और उन्होंने अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया। वह दिन में 8 बार भोजन करते थे, इसलिए जब पर्वत नीचे रखा गया, तब ब्रजवासियों ने उनके लिए 7 दिन और 8 पहर के हिसाब से 56 भोग (7 x 8 = 56) तैयार किए। यहीं से भगवान को 56 भोग लगाने की परंपरा शुरू हुई।