जाने-अनजाने में हुए सारे पाप धो सकता है यह एक व्रत! जानें आज इसकी चमत्कारी महिमा

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हम सब इंसान हैं और अपनी जिंदगी में जाने-अनजाने में हमसे कितनी ही गलतियां और पाप हो जाते हैं। फिर मन में एक बोझ रह जाता है कि काश, इन गलतियों से मुक्ति पाने का कोई रास्ता होता!

तो आज वही खास दिन है। शास्त्रों के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही जाहिर है - ‘पाप’ रूपी हाथी को पुण्य के ‘अंकुश’ से नियंत्रित करने वाली एकादशी।

माना जाता है कि इस एक दिन का व्रत पूरी श्रद्धा से रखने पर व्यक्ति के कई जन्मों के पाप भी धुल जाते हैं और उसके लिए स्वर्ग के द्वार खुल जाते हैं। यह व्रत भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप को समर्पित है।

पापांकुशा एकादशी 2025 की तारीख और शुभ मुहूर्त

  • एकादशी की तारीख: आज, यानी 3 अक्टूबर 2025, शुक्रवार
  • एकादशी तिथि कब से कब तक:
    • शुरू: 2 अक्टूबर, रात 09:47 से
    • समाप्त: 3 अक्टूबर, रात 09:39 तक
  • पूजा का शुभ मुहूर्त:
    आज सुबह 07:44 से सुबह 10:41 तक पूजा के लिए सबसे उत्तम समय है।
  • व्रत खोलने का समय (पारण मुहूर्त):
    व्रत हमेशा द्वादशी तिथि पर ही खोला जाता है। व्रत खोलने का सही समय 4 अक्टूबर, शनिवार को सुबह 06:15 से सुबह 08:37 के बीच रहेगा।

कैसे करें घर पर सरल पूजा? (पूजा विधि)

इस व्रत को करने के लिए किसी आडंबर की नहीं, बल्कि सच्चे मन की जरूरत होती है:

  1. सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।
  3. भगवान को पीले फूल, फल (विशेषकर केला), अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। याद रखें, भगवान विष्णु की पूजा तुलसी के बिना अधूरी मानी जाती है।
  4. घी का दीपक और धूप जलाकर पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  5. पूजा करते समय भगवान विष्णु के सबसे सरल और शक्तिशाली मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का जाप करते रहें।
  6. पूरे दिन अन्न का त्याग करें। आप फल, दूध और फलाहारी चीजों का सेवन कर सकते हैं।
  7. रात में जागरण करके भगवान का भजन-कीर्तन करना बहुत शुभ माना जाता है।
  8. अगले दिन, यानी 4 अक्टूबर को, सुबह स्नान-पूजा करने के बाद किसी ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दें और फिर ऊपर दिए गए शुभ मुहूर्त में अपना व्रत खोलें।

माना जाता है कि इस एकादशी का पुण्य, सौ सूर्य यज्ञ और एक हजार अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर होता है।