केरल या केरलम? शशि थरूर ने नाम बदलने के प्रस्ताव पर उठाए सवाल बोले अंग्रेजी में Kerala ही क्यों सही है

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News India Live, Digital Desk: केरल विधानसभा द्वारा राज्य का नाम बदलकर 'केरलम' करने के सर्वसम्मत प्रस्ताव के बीच, अपनी बेबाक बयानबाजी और भाषाई पकड़ के लिए मशहूर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने एक नई बहस छेड़ दी है। थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक लंबी पोस्ट साझा करते हुए इस बदलाव की आवश्यकता और इसके अंग्रेजी व्याकरण पर सवाल उठाए हैं।

शशि थरूर का मुख्य तर्क: "भाषा का अंतर समझें"

शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि वे राज्य की पहचान के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन नाम बदलने की प्रक्रिया में भाषाई बारीकियों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनकी मुख्य बातें:

मलयालम बनाम अंग्रेजी: थरूर का तर्क है कि 'केरलम' शब्द मलयालम भाषा के व्याकरण के अनुसार बिल्कुल सही है, लेकिन अंग्रेजी (English) में 'Kerala' कहना एक स्थापित परंपरा है।

संस्कृत और मूल जड़ें: उन्होंने बताया कि 'केरल' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत और प्राचीन तमिल से जुड़ी है, जहाँ अंत में 'म' (M) जोड़ना मलयालम की विशिष्टता है।

क्या बदलाव जरूरी है?: थरूर ने सवाल किया कि क्या हमें हर भाषा में एक ही उच्चारण थोपना चाहिए? जैसे हम अंग्रेजी में 'India' कहते हैं और हिंदी में 'भारत', वैसे ही मलयालम में 'केरलम' और अन्य भाषाओं में 'केरल' रहने में क्या बुराई है?

संवैधानिक पेच: क्या कहता है नियम?

केंद्र सरकार यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है, तो संविधान की पहली अनुसूची (First Schedule) में संशोधन करना होगा।

शशि थरूर का मानना है कि इस बदलाव से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और आधिकारिक दस्तावेजों में 'ब्रांड केरल' की पहचान पर असर पड़ सकता है, जिसे दशकों से इसी नाम से जाना जाता रहा है।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

थरूर की इस पोस्ट के बाद इंटरनेट दो गुटों में बंट गया है:

समर्थक: कई लोग थरूर की इस बात से सहमत हैं कि हर भाषा की अपनी प्रकृति होती है और जबरन नाम बदलना केवल प्रशासनिक जटिलता बढ़ाएगा।

विरोधी: वहीं, एक बड़ा वर्ग यह कह रहा है कि जब ओडिशा, पुडुचेरी और कर्नाटक (मैसूर से) के नाम बदले जा सकते हैं, तो अपनी मातृभाषा के सम्मान में 'केरलम' करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

सरकार का अगला कदम?

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन पहले ही कह चुके हैं कि यह बदलाव राज्य की सांस्कृतिक अस्मिता का हिस्सा है। अब गेंद केंद्र सरकार के पाले में है। यदि कैबिनेट इसे मंजूरी देती है, तो संसद के आगामी सत्र में नाम परिवर्तन का विधेयक लाया जा सकता है।