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March 25 2026 07:01 pm

असम के रण में JMM का एकला चलो रे झारखंड में दोस्ती, पर असम में कांग्रेस से ठनी 21 सीटों पर ठोंकी ताल

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News India Live, Digital Desk : असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए नामांकन के आखिरी दिन (23 मार्च) झारखंड की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने एक बड़ा सियासी धमाका कर दिया है। झारखंड में कांग्रेस के साथ सरकार चला रहे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी ने असम में गठबंधन की उम्मीदें तोड़ते हुए अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। कई दौर की बातचीत और बैठकों के बाद भी जब कांग्रेस के साथ 'सीट शेयरिंग' पर सहमति नहीं बनी, तो JMM ने अपने 21 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी। इस फैसले ने न केवल विपक्षी गठबंधन 'INDIA' में दरार के संकेत दिए हैं, बल्कि असम के ऊपरी इलाकों (Upper Assam) में कांग्रेस की मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं।

क्यों फेल हुई कांग्रेस-JMM की बातचीत?

सूत्रों के मुताबिक, JMM असम में कम से कम 25 से 35 सीटों की मांग कर रही थी, जबकि कांग्रेस उसे केवल 5 से 7 सीटें देने को तैयार थी। JMM के रणनीतिकारों का तर्क था कि असम के चाय बागानों में काम करने वाले करीब 70 लाख 'चाय जनजाति' (Tea Tribes) के लोग मूल रूप से झारखंड के आदिवासी हैं, जिन पर JMM की अच्छी पकड़ है। वहीं, कांग्रेस का मानना था कि वह राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी है और उसने पहले ही क्षेत्रीय दलों (जैसे रायजोर दल) के साथ तालमेल कर लिया है। आखिर में, JMM ने "न कांग्रेस, न बीजेपी" का नारा बुलंद करते हुए मैदान में उतरने का फैसला किया।

JMM का सबसे बड़ा दांव: 70 लाख चाय मजदूर

असम की 126 विधानसभा सीटों में से करीब 36-38 सीटें ऐसी हैं जहाँ चाय बागान मजदूरों और आदिवासियों का वोट निर्णायक होता है। JMM इन्हीं सीटों को टारगेट कर रही है।

क्षेत्र: तिनसुकिया, डिब्रूगढ़, शिवसागर और जोरहाट जैसे ऊपरी असम के जिले।

मुख्य मुद्दे: चाय मजदूरों की मजदूरी में बढ़ोतरी, जमीन का पट्टा (Land Pattas) और आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाना।

प्रचार कमान: खुद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन असम में मोर्चा संभालेंगे। पार्टी का मानना है कि जो आदिवासी समुदाय लंबे समय से कांग्रेस और बीजेपी के बीच पिस रहा है, वह JMM को 'तीसरे विकल्प' के रूप में देखेगा।

वोट बैंक की जंग: किसे होगा नुकसान?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि JMM के अकेले लड़ने से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है।

वोटों का बिखराव: चाय जनजाति का वोट पारंपरिक रूप से कांग्रेस का रहा है, जिस पर अब बीजेपी ने सेंध लगाई है। JMM के आने से विपक्षी वोट बंट सकते हैं, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिल सकता है।

झारखंड पर असर: हालांकि कांग्रेस प्रवक्ताओं का कहना है कि इसका असर झारखंड के गठबंधन पर नहीं पड़ेगा, लेकिन चुनावी रंजिश का असर भविष्य के कूटनीतिक संबंधों पर दिख सकता है।

INDIA ब्लॉक की साख: राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने का दावा करने वाले दल जब राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते हैं, तो जनता के बीच गलत संदेश जाता है।

चुनाव कार्यक्रम पर एक नजर

असम में 126 सीटों के लिए 9 अप्रैल 2026 को मतदान होगा और सभी पांच राज्यों (असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी) के नतीजे 4 मई 2026 को आएंगे। JMM की वापसी करीब 15 साल बाद असम की राजनीति में हो रही है (पिछली बार 2011 में चुनाव लड़ा था)। अब देखना होगा कि हेमंत सोरेन का 'झारखंडी कार्ड' असम के चाय बागानों में कितनी खुशबू फैला पाता है।