Jitiya Vrat 2025 : आखिर क्यों सूर्योदय से पहले खाया जाता है 'ओठगन'? जानें इस अनोखी परंपरा का राज

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News India Live, Digital Desk: भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहारों का एक अलग ही महत्व है. हर व्रत के पीछे एक कहानी और कुछ खास परंपराएं जुड़ी होती हैं. ऐसा ही एक बहुत कठिन और महत्वपूर्ण व्रत है 'जितिया', जिसे 'जीवित्पुत्रिका व्रत' के नाम से भी जाना जाता है. यह व्रत मां अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं. इस व्रत में महिलाएं लगभग 24 घंटे तक बिना कुछ खाए-पिए, यानी निर्जला व्रत रखती हैं.

लेकिन इस कठिन व्रत की शुरुआत एक बहुत ही अनोखी और दिलचस्प परंपरा से होती है, जिसे 'ओठगन' कहा जाता है. इसमें महिलाएं व्रत शुरू होने से ठीक पहले, यानी सूर्योदय से भी पहले भरपेट भोजन करती हैं. यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है कि इतने कठिन उपवास से पहले खूब खाया-पिया जाता है. तो चलिए, आज इसी परंपरा के पीछे छिपे महत्व और कारण को समझते हैं.

कब है जितिया व्रत 2025?

साल 2025 में जितिया का व्रत 25 सितंबर, दिन गुरुवार को रखा जाएगा. इस व्रत का 'नहाय-खाय' 24 सितंबर को होगा और व्रत का पारण 26 सितंबर को सूर्योदय के बाद किया जाएगा. 'ओठगन' की रस्म 25 सितंबर को सूर्योदय से ठीक पहले, ब्रह्म मुहूर्त में निभाई जाएगी.

क्या है 'ओठगन' की परंपरा?

'ओठगन' का मतलब है 'होंठों से लगाना' या 'खाना'. यह परंपरा जितिया व्रत का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है. इस दिन व्रती महिलाएं सुबह लगभग 3-4 बजे के आसपास उठकर कुछ खास चीजें खाती हैं. इसके बाद वे पूरे दिन और पूरी रात कुछ भी नहीं खातीं, यहां तक कि पानी की एक बूंद भी नहीं पीतीं.

क्यों जरूरी है 'ओठगन'?

इस परंपरा के पीछे एक बहुत गहरा व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण छिपा है.

  1. शरीर को ऊर्जा देना: जितिया का व्रत बहुत कठिन होता है और इसमें शरीर को बहुत ऊर्जा की जरूरत होती है. 'ओठगन' में खाया गया भोजन दिन भर शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा देता रहता है, जिससे महिलाएं इस कठिन व्रत को बिना किसी स्वास्थ्य समस्या के पूरा कर पाती हैं. यह एक तरह से शरीर को इस निर्जला उपवास के लिए तैयार करने जैसा है.
  2. सरगी की तरह है यह परंपरा: जैसे करवा चौथ के व्रत में 'सरगी' का महत्व होता है, ठीक वैसे ही जितिया में 'ओठगन' का महत्व है. यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि व्रत रखने वाली महिला की सेहत का ध्यान रखने का एक तरीका है, जिसे हमारी पूर्वजों ने बहुत सोच-समझकर बनाया था.
  3. पारिवारिक स्नेह का प्रतीक: अक्सर 'ओठगन' का भोजन सास अपनी बहू को बनाकर खिलाती हैं. यह परिवार में प्यार और अपनेपन को भी दर्शाता है, जिसमें घर के बड़े-बुजुर्ग व्रत रखने वाली महिला की सेहत और ताकत की चिंता करते हैं.

'ओठगन' में क्या खाया जाता है?

आमतौर पर 'ओठगन' में ऐसी चीजें खाई जाती हैं जो पचने में आसान हों और दिन भर शरीर में नमी बनाए रखें. कई जगहों पर मिठाई, फल और रोटी-सब्जी खाई जाती है. मिथिलांचल और बिहार के कुछ हिस्सों में मछली खाने की भी परंपरा है, क्योंकि इसे शुभ माना जाता है. हालांकि, क्षेत्र और पारिवारिक मान्यताओं के हिसाब से खाए जाने वाले पकवान अलग-अलग हो सकते हैं.

'ओठगन' की यह परंपरा हमें सिखाती है कि हमारे व्रत-त्योहार सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि वे विज्ञान, सेहत और पारिवारिक रिश्तों के गहरे धागों से भी जुड़े हुए हैं.