TSPC सुप्रीमो बृजेश गंझू की मौत के साथ झारखंड में खौफ के एक बड़े चैप्टर का अंत
झारखंड के आपराधिक और नक्सली इतिहास में आतंक का पर्याय बन चुका तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TSPC) का कुख्यात सुप्रीमो बृजेश गंझू अब इस दुनिया में नहीं रहा है, और उसकी मौत के साथ ही राज्य में पिछले दो दशकों से चले आ रहे खौफ के एक बहुत बड़े और काले अध्याय का हमेशा के लिए खात्मा हो गया है। कभी पलामू, चतरा, लातेहार और हजारीबाग के जंगलों से लेकर कोयलांचल के इलाकों तक अपनी हुकूमत चलाने वाले इस दुर्दांत उग्रवादी के नाम से पूरा प्रशासनिक अमला और व्यापारी वर्ग थर-थर कांपता था। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बन चुका बृजेश गंझू अपने संगठन के जरिए बड़े पैमाने पर लेवी वसूली, हत्या, अपहरण और बम धमाकों की वारदातों को अंजाम देता था। उसके खिलाफ अकेले झारखंड के विभिन्न थानों में हत्या, रंगदारी, आर्म्स एक्ट और क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट के तहत 44 से अधिक बेहद गंभीर मामले दर्ज थे। इस खूंखार उग्रवादी के खात्मे की खबर सामने आने के बाद से राज्य के सुरक्षा महकमे और स्थानीय निवासियों ने एक बड़ी राहत की सांस ली है।
भारतीय आंतरिक सुरक्षा और खासकर नक्सल प्रभावित राज्यों के इतिहास में यह घटना एक बहुत बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है। झारखंड की गोद में छिपे घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों का फायदा उठाकर कैसे कुछ अपराधी संगठन समानांतर सत्ता चलाने की कोशिश करते हैं, बृजेश गंझू उसका एक सबसे बड़ा उदाहरण था। जब कानून का शिकंजा किसी बड़े अपराधी पर कसता है, तो किस तरह से राज्य से आतंक का सफाया होता है, यह मामला इसका जीवंत प्रमाण है। आइए इस कुख्यात उग्रवादी के साम्राज्य, उसके द्वारा फैलाए गए आतंक और उसके खात्मे तक की पूरी रोमांचक और सनसनीखेज दास्तान के बारे में विस्तार से जानते हैं।
कैसे खड़ा हुआ TSPC का यह साम्राज्य और क्या था बृजेश गंझू का खौफनाक नेटवर्क?
तृतीय प्रस्तुति कमेटी यानी टीएसपीसी (TSPC) संगठन का उदय मुख्य रूप से भाकपा माओवादी (CPI-Maoist) संगठन से वैचारिक मतभेद और वर्चस्व की लड़ाई के बाद हुआ था। शुरुआती दौर में छोटे-मोटे अपराधों से अपनी शुरुआत करने वाला बृजेश गंझू धीरे-धीरे अपनी क्रूरता और संगठनात्मक क्षमता के बल पर इस उग्रवादी संगठन के शीर्ष पद यानी सुप्रीमो की कुर्सी तक जा पहुंचा। उसने झारखंड के ग्रामीण और वन क्षेत्रों में एक ऐसा समानांतर नेटवर्क तैयार कर लिया था, जहां बिना उसकी मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता था। कोयला खदानों, सड़क निर्माण करने वाली कंपनियों, बड़े ठेकेदारों और स्थानीय व्यवसायियों से करोड़ों रुपये की लेवी (रंगदारी) वसूलना उसका मुख्य पेशा बन चुका था। जो भी व्यक्ति या कंपनी उसकी मांग को पूरा करने से इनकार करती थी, उसे मौत के घाट उतार दिया जाता था या उसकी मशीनों को फूंक दिया जाता था।
बृजेश गंझू का नेटवर्क सिर्फ वसूली तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने कई बार सुरक्षा बलों पर घातक घात लगाकर हमले किए थे, जिनमें देश के कई वीर जवान शहीद हुए थे। झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ (CRPF) और कोबरा बटालियन की संयुक्त टीमों ने उसे पकड़ने के लिए पिछले कई वर्षों से जाल बिछा रखा था, लेकिन अपनी पैतृक भौगोलिक स्थिति और मुखबिर तंत्र के मजबूत होने के कारण वह हर बार सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देने में कामयाब हो जाता था। राज्य सरकार ने उस पर भारी-भरकम इनाम भी घोषित कर रखा था, और उसकी गिरफ्तारी या खात्मा झारखंड पुलिस के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बन चुका था।
हत्या और रंगदारी के 44 मामलों का बोझ: कानून के शिकंजे में कैसे कसा गया शिकंजा?
एक कुख्यात अपराधी के रूप में बृजेश गंझू के खिलाफ दर्ज मामलों की फेहरिस्त इतनी लंबी थी कि झारखंड के शायद ही किसी बड़े जिले का थाना ऐसा बचा हो जहां उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल न हुई हो। हत्या के प्रयास, पुलिस बल पर हमला, अपहरण, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और लेवी वसूलने के कुल 44 से अधिक संगीन मामले उसके नाम पर दर्ज थे। अदालतों में उसके खिलाफ कई मामलों में गैर-जमानती वारंट जारी हो चुके थे और पुलिस लगातार उसकी तलाश में जुटी हुई थी। इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय स्तर की जांच एजेंसियों ने भी उसकी गतिविधियों पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी थी, क्योंकि वह केवल एक स्थानीय अपराधी नहीं बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा था।
जब पुलिस और सुरक्षा बलों ने उसके सहयोगियों और आर्थिक स्रोतों (फंडिंग चैनल्स) पर शिकंजा कसना शुरू किया, तो धीरे-धीरे इस उग्रवादी संगठन की कमर टूटनी शुरू हो गई। उसके कई करीबी कमांडर या तो पुलिस मुठभेड़ में मारे गए या फिर गिरफ्तार कर लिए गए, जिससे बृजेश गंझू अंदर से पूरी तरह अकेला और कमजोर पड़ता चला गया। कानून और न्याय की लंबी प्रक्रिया के बीच आखिरकार उसके अंत की खबर ने यह साबित कर दिया कि अपराध की दुनिया का अंत हमेशा पतन और बर्बादी के साथ ही होता है, चाहे वह कितना भी शातिर क्यों न हो।
झारखंड के कोयलांचल और ग्रामीण इलाकों में विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा था TSPC
झारखंड जैसे खनिज संपदा से भरपूर राज्य में विकास कार्यों के रास्ते में उग्रवाद और नक्सलवाद हमेशा से सबसे बड़ी बाधा रहे हैं। जब राज्य में सड़क निर्माण, रेलवे लाइन बिछाने या बिजली संयंत्रों का काम शुरू होता था, तो टीएसपीसी जैसे संगठन तुरंत अपनी लेवी वसूलने के लिए सक्रिय हो जाते थे। बृजेश गंझू अपने गुर्गों के जरिए निर्माण कंपनियों के ठेकेदारों में इतना खौफ पैदा कर देता था कि लोग बिना पुलिस सुरक्षा के काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे। उसके डर के कारण कई बार बड़े विकास प्रोजेक्ट्स समय पर पूरे नहीं हो पाते थे, जिसका सीधा नुकसान राज्य की आम जनता और यहां के युवाओं को भुगतना पड़ता था।
अब जब इस आतंक के पर्याय का अंत हो चुका है, तो उम्मीद की जा रही है कि झारखंड के उन सुदूर इलाकों के व्यापारियों, ठेकेदारों और आम नागरिकों में जो डर का माहौल बना हुआ था, वह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। स्थानीय लोगों का कहना है कि बृजेश गंझू के खात्मे के बाद अब इलाके में शांति और आर्थिक गतिविधियों को एक नई रफ्तार मिलेगी, क्योंकि अब किसी को भी अवैध लेवी के नाम पर अपनी जान की भीख नहीं मांगनी पड़ेगी। यह झारखंड पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए एक ऐतिहासिक सफलता है, जिसने राज्य के माथे से उग्रवाद के एक बड़े कलंक को मिटाने का काम किया है।