हजारीबाग के जंगलों में फिर से गूंजी विलुप्तप्राय गिद्धों की गूंज: सुरक्षित जोन में तेजी से बढ़ रही संख्या

हजारीबाग के जंगलों में फिर से गूंजी विलुप्तप्राय गिद्धों की गूंज: सुरक्षित जोन में तेजी से बढ़ रही संख्या

झारखंड के खूबसूरत और प्राकृतिक छटा बिखेरने वाले हजारीबाग जिले से पर्यावरण प्रेमियों और वन्यजीव संरक्षकों के लिए एक बेहद राहत भरी और खुशखबरी सामने आ रही है। कभी प्रकृति के सबसे बड़े सफाईकर्मी कहे जाने वाले और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के प्रतीक माने जाने वाले 'गिद्ध' (Vultures), जो पिछले कुछ दशकों से देश भर से तेजी से विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए थे, अब हजारीबाग के जंगलों और सुरक्षित जोन्स (Safe Zones) में फिर से वापसी करने लगे हैं। वन्यजीव विभाग और स्थानीय प्रकृति प्रेमियों द्वारा हाल ही में किए गए सर्वे और मॉनिटरिंग के दौरान यह चौंकाने वाली और सुखद बात सामने आई है कि हजारीबाग के संरक्षित क्षेत्रों में गिद्धों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। आसमान में एक बार फिर से इन विशाल पक्षियों की ऊंची और अठखेलियां करती उड़ानें दिखाई देने लगी हैं, जिसे पर्यावरण वैज्ञानिकों ने पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक बहुत बड़ा और सकारात्मक बदलाव करार दिया है। एक समय था जब देश भर में डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) जैसी दर्द निवारक दवाओं के अंधाधुंध पशुओं पर इस्तेमाल के कारण गिद्धों की आबादी 99 प्रतिशत तक खत्म हो गई थी, लेकिन हजारीबाग प्रशासन और वन विभाग द्वारा चलाए गए विशेष संरक्षण प्रयासों के चलते अब इन विलुप्तप्राय जीवों को जीवनदान मिलता हुआ साफ नजर आ रहा है।

हजारीबाग वन्यजीव अभयारण्य और उसके आसपास के पहाड़ी इलाकों में गिद्धों की बढ़ती मौजूदगी इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर पर्यावरण संतुलन को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयास सही दिशा में काम कर रहे हैं। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने पिछले कुछ महीनों में पेड़ों की ऊंची चोटियों और चट्टानी इलाकों में गिद्धों के कई नए घोंसले और उनके चूहे (Nestlings) देखे हैं, जो यह साबित करता है कि ये पक्षी अब इन सुरक्षित ठिकानों पर स्थायी रूप से बसने लगे हैं। प्रकृति में गिद्धों का होना किसी सैनिटरी वर्कर की तरह काम करता है, क्योंकि ये मृत जानवरों के अवशेषों को खाकर पर्यावरण को सड़न और खतरनाक बीमारियों फैलने से बचाते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं कि हजारीबाग में गिद्धों की इस शानदार वापसी के पीछे कौन से मुख्य कारण हैं और पर्यावरण के लिए यह कितना बड़ा वरदान साबित हो रहा है।

क्यों हो रही है हजारीबाग में गिद्धों की वापसी और क्या हैं इसके मुख्य कारण?

विशेषज्ञों के अनुसार, हजारीबाग के जंगलों में गिद्धों की संख्या में वृद्धि के पीछे कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और प्रशासनिक कदम जिम्मेदार हैं। इनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • डाइक्लोफेनाक दवा पर प्रभावी रोक: पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली उस खतरनाक दवा पर कड़ाई से प्रतिबंध लगाया गया है जो गिद्धों के लिए जहर का काम करती थी।

  • सुरक्षित प्राकृतिक आवास (Safe Habitats): हजारीबाग के जंगलों में गिद्धों के रहने, घोंसला बनाने और प्रजनन करने के लिए पूरी तरह शांत और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराया गया है।

  • पर्यावरण जागरूकता अभियान: स्थानीय ग्रामीणों और पशुपालकों को जागरूक किया गया है कि वे मृत पशुओं को ऐसे खुले में न छोड़ें जिनमें जहरीले केमिकल्स हों।

पर्यावरण और वन्यजीव संतुलन के लिए क्यों जरूरी हैं गिद्ध?

प्रकृति के चक्र में गिद्धों की भूमिका को किसी भी कीमत पर नकारा नहीं जा सकता है। इन्हें प्रकृति का 'प्राकृतिक क्लीनर' (Natural Scavenger) कहा जाता है। जब जंगल या ग्रामीण इलाकों में किसी मवेशी की मौत होती है, तो गिद्ध कुछ ही घंटों में उस मृत शरीर को पूरी तरह साफ कर देते हैं, जिससे पर्यावरण में खतरनाक बैक्टीरिया और बीमारियां फैलने का खतरा टल जाता है। यदि गिद्ध न हों तो सड़ते हुए शवों से हैजा, एन्थ्रेक्स और रेबीज जैसी भयानक बीमारियां इंसानों और अन्य जानवरों में फैल सकती हैं। हजारीबाग में इनकी संख्या का बढ़ना इस बात का संकेत है कि हमारा स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र फिर से अपने प्राकृतिक संतुलन की पटरी पर लौट रहा है। वन्यजीव प्रेमियों और जिला प्रशासन का यह साझा प्रयास आने वाले समय में देश भर के लिए एक मिसाल बनता जा रहा है, और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले वर्षों में झारखंड के अन्य जंगलों में भी गिद्धों की यह उड़ान और अधिक व्यापक रूप लेगी।