झारखंड के मुख्यमंत्री की कर्तव्यनिष्ठा और सादगी देख चौंके लोग, शोक के बीच ऐसे चल रहा राजकाज

झारखंड के मुख्यमंत्री की कर्तव्यनिष्ठा और सादगी देख चौंके लोग, शोक के बीच ऐसे चल रहा राजकाज

झारखंड की राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है जो हर किसी को भावुक भी कर रही है और अपनी जिम्मेदारी के प्रति अटूट कर्तव्यनिष्ठा का एक अनूठा उदाहरण भी पेश कर रही है. राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इन दिनों अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक शोक के बीच भी जिस प्रकार से शासकीय दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, उसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है. रामगढ़ जिले के उनके पैतृक गांव नेमरा में इन दिनों उनकी दिवंगत माता (रूपी सोरेन) के निधन के बाद पारंपरिक शोक और संस्कार की रस्में पूरी की जा रही हैं. इन तमाम धार्मिक और पारिवारिक अनुष्ठानों के बीच मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पारंपरिक वेशभूषा यानी पैरों में लकड़ी की खड़ाऊं और शरीर पर साधारण सफेद धोती धारण किए हुए नजर आए, लेकिन इस कठिन और संवेदनशील परिस्थिति में भी उन्होंने राज्य के राजकाज और प्रशासनिक कामकाज को रुकने नहीं दिया और नेमरा गांव से ही सरकारी फाइलों पर लगातार दस्तखत कर रहे हैं.

पैतृक गांव नेमरा में मातम का माहौल, पारंपरिक संस्कारों के साथ-साथ फाइलों का निपटारा कर रहे हैं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन

पारिवारिक दुखों के पहाड़ टूटने के बावजूद एक राज्य के मुखिया की जिम्मेदारी कितनी बड़ी होती है, इसका वास्तविक उदाहरण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने पेश किया है. प्राप्त जानकारी के अनुसार, जब कोई नेता या उच्च पद पर बैठा व्यक्ति इस तरह के व्यक्तिगत शोक में होता है, तो वह आम तौर पर कुछ दिनों के लिए पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन और कामकाज से दूरी बना लेता है, लेकिन झारखंड के सीएम ने परंपरा और कर्तव्य दोनों का एक साथ निर्वहन करने का अनूठा मार्ग चुना है. नेमरा स्थित उनके आवास पर जहां एक तरफ वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक शोक के रीति-रिवाज निभाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य के विकास कार्यों, नीतिगत निर्णयों और आपातकालीन फाइलों को मंजूरी देने के लिए अधिकारियों का आना-जाना भी लगातार बना हुआ है. मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके व्यक्तिगत दुखों के कारण झारखंड की सवा तीन करोड़ जनता का कोई भी सरकारी काम या विकास योजना बाधित नहीं होनी चाहिए.

माता के निमित्त भोजन परोसने की रस्म के दौरान भी प्रशासनिक सतर्कता, गांव से ही चल रहा है पूरा सरकारी तंत्र

स्थानीय रीति-रिवाजों और झारखंड की पारंपरिक संस्कृति के अनुसार, दिवंगत आत्मा की शांति और उनकी याद में आयोजित होने वाली विभिन्न रस्मों में परिवार के मुख्य सदस्य को विशेष रूप से शामिल होना पड़ता है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपनी माता रूपी सोरेन के निमित्त भोजन परोसने और अन्य पारंपरिक संस्कारों को पूरी श्रद्धा, सादगी और विधान के साथ निभाया है. इन धार्मिक और पारंपरिक आयोजनों के दौरान उनके पैरों में चमड़े या आधुनिक जूतों के बजाय पारंपरिक लकड़ी की 'खड़ाऊं' और शरीर पर सिर्फ एक सफेद धोती लिपटी हुई थी, जो भारतीय संस्कृति में शोक और वैराग्य का प्रतीक मानी जाती है. इसी पारंपरिक और सादगी भरे पहनावे में जब मुख्यमंत्री ने सचिवालय से भेजी गई अति-आवश्यक प्रशासनिक फाइलों को मंगवाकर उनका अध्ययन किया और उन पर अपने दस्तखत किए, तो वहां मौजूद हर कोई उनकी इस कार्यशैली को देखकर हैरान रह गया.

मंत्रियों और शीर्ष अधिकारियों का नेमरा पहुंचना, गांव से ही हो रही है राज्य के नीतिगत मामलों की मॉनिटरिंग

झारखंड सरकार का प्रशासनिक ढांचा इस वक्त राजधानी रांची से बाहर रामगढ़ के नेमरा गांव से संचालित होता हुआ नजर आ रहा है. राज्य के कई प्रमुख मंत्रियों, कैबिनेट सहयोगियों और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों ने पिछले कुछ दिनों में नेमरा पहुंचकर मुख्यमंत्री से मुलाकात की है और राज्य की मौजूदा कानून-व्यवस्था, विकास योजनाओं तथा आगामी प्रशासनिक बैठकों के एजेंडे पर चर्चा की है. रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ और वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर सहित कई बड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों ने नेमरा पहुंचकर मुख्यमंत्री के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं और साथ ही जरूरी शासकीय कार्यों पर उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया है. मुख्य सचिव और अन्य सचिव स्तर के अधिकारी भी राजधानी से फाइलें लेकर सीधे पैतृक गांव पहुंच रहे हैं ताकि राज्य के किसी भी महकमे में नीतिगत फैसले रुकने न पाएं.

झारखंड की राजनीति में हेमंत सोरेन का यह रूप चर्चा का विषय, कर्तव्य और परंपरा का अद्भुत संतुलन

राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि आधुनिक युग की राजनीति में इस तरह का दृश्य बहुत कम देखने को मिलता है जहां कोई राजनेता अपने परिवार के सबसे बड़े और गहरे शोक के बीच भी जनता के प्रति अपनी जवाबदेही को इतनी संवेदनशीलता के साथ निभाए. एक तरफ जहां पारंपरिक वेशभूषा में खड़ाऊं पहनकर वे अपनी माटी और संस्कृति के प्रति अपनी गहरी निष्ठा का परिचय दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ फाइलों पर लगातार दस्तखत करके वे यह साबित कर रहे हैं कि झारखंड की जनता ने उन्हें जिस भरोसे के साथ कुर्सी सौंपी है, वे उस पर हर परिस्थिति में खरे उतरने का प्रयास कर रहे हैं. इस पूरी घटना ने झारखंड की राजनीति में एक नया संदेश दिया है और विपक्षी दलों के साथ-साथ आम जनता के बीच भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस समर्पण भाव की प्रशंसा की जा रही है.

आने वाले दिनों में जब ये पारंपरिक शोक और संस्कार पूरी तरह संपन्न हो जाएंगे, तब मुख्यमंत्री अपनी नियमित बैठकों के लिए वापस रांची लौटेंगे, लेकिन इन कुछ दिनों में जिस तरह से नेमरा गांव से ही झारखंड का पूरा राजकाज चलाया गया है, वह अपने आप में प्रशासनिक इतिहास का एक अनूठा पन्ना बन गया है. सादगी, परंपरा, व्यक्तिगत संवेदना और राजकीय कर्तव्य का यह संगम झारखंड की राजनीति में एक लंबी लकीर खींच गया है, जो यह बताता है कि संकट और शोक की आंधी में भी एक सच्चे जननेता का संकल्प कभी डगमगाता नहीं है.