परिमल नाथवानी की एंट्री से फंसा पेंच, जानें क्यों उड़ गई कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की नींद
झारखंड की सियासत में इन दिनों दिल्ली से ज्यादा रांची की हलचल पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। सूबे में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने जा रहे चुनाव ने एक बेहद दिलचस्प और सस्पेंस से भरा मोड़ ले लिया है। निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर देश के दिग्गज उद्योगपति परिमल नाथवानी के नामांकन को हरी झंडी मिलने के बाद अब मुकाबला त्रिकोणीय हो चुका है। इस एक फैसले ने सत्तारूढ़ गठबंधन, खासकर कांग्रेस खेमे में खलबली मचा दी है। आइए सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि आखिर झारखंड विधानसभा का वह सियासी अंकगणित क्या है जिसने कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की राह को बेहद कांटों भरा बना दिया है।
क्या है जीत का जादुई आंकड़ा और विधानसभा का मौजूदा समीकरण
झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर कब्जा जमाने के लिए इस बार शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। मौजूदा गणित के हिसाब से किसी भी प्रत्याशी को पहली वरीयता (First Preference) के आधार पर सीधे उच्च सदन पहुंचने के लिए न्यूनतम 28 विधायकों के वोटों की जरूरत होगी। विधानसभा की कुल सीटों और मौजूदा संख्या बल को देखें तो सत्ताधारी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत दिखाई देता है, लेकिन परिमल नाथवानी जैसी कद्दावर शख्सियत के मैदान में होने से यह चुनावी जंग अब सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गई है।
सत्तापक्ष का गणित: कागजों पर मजबूत फिर भी क्यों बढ़ी कांग्रेस की धड़कनें
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन के पास कुल मिलाकर 56 विधायकों का मजबूत समर्थन हासिल है। इस लिहाज से तकनीकी रूप से गठबंधन अपने दोनों प्रत्याशियों को आसानी से जिता सकता है। जेएमएम ने इस बार अपने दलित चेहरे बैद्यनाथ राम को मैदान में उतारा है, जबकि कांग्रेस की ओर से प्रणव झा उम्मीदवार हैं। चूंकि जेएमएम विधानसभा में सबसे बड़ा दल है, इसलिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी के प्रत्याशी बैद्यनाथ राम को प्रथम वरीयता के सुरक्षित 28 वोट मिलना लगभग तय माना जा रहा है। असली पेंच कांग्रेस के प्रणव झा के साथ फंस रहा है, क्योंकि बचे हुए वोटों के बिखराव या क्रॉस वोटिंग का सीधा खतरा उन पर मंडरा रहा है।
एनडीए का मास्टरस्ट्रोक: बीजेपी की रणनीति और नाथवानी का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड
दूसरी तरफ, मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सहयोगियों (आजसू, जदयू, लोजपा-आर) को मिलाकर एनडीए का कुल आंकड़ा फिलहाल 24 विधायकों तक पहुंचता है। यह संख्या जीत के जरूरी आंकड़े (28) से 4 वोट कम है। इसी वजह से बीजेपी ने अपना कोई आधिकारिक उम्मीदवार उतारने के बजाय रणनीतिक रूप से निर्दलीय परिमल नाथवानी को वॉकओवर देते हुए अपना खुला समर्थन दे दिया है। नाथवानी को जीत के लिए केवल 4 अतिरिक्त वोटों की दरकार है। चूंकि परिमल नाथवानी पहले भी दो बार झारखंड से निर्दलीय राज्यसभा सांसद रह चुके हैं, इसलिए सभी राजनीतिक दलों के विधायकों में उनकी व्यक्तिगत पैठ और 'मैनेजमेंट' की क्षमता से हर कोई वाकिफ है।
प्रणव झा बनाम परिमल नाथवानी: क्यों फंस गया है पेंच
कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही पार्टी और गठबंधन के भीतर असंतोष को थामना है। सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि अगर परिमल नाथवानी ने निर्दलीय, असंतुष्ट या छोटे दलों के विधायकों को अपने पाले में कर लिया, तो दूसरी सीट के लिए होने वाली द्वितीय वरीयता (Second Preference) की गिनती में खेल पूरी तरह पलट सकता है। कांग्रेस को डर है कि उसके कोटे के कुछ वोट खिसक सकते हैं, यही वजह है कि कांग्रेस नेता लगातार हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका जताते हुए नाथवानी के नामांकन का विरोध कर रहे थे। अब जब नाथवानी रेस में पूरी तरह बने हुए हैं, तो प्रणव झा को दिल्ली और रांची के बीच अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है।