कोयला चोरी और अवैध खनन को बढ़ावा देने के लिए MMDR का विरोध
झारखंड की राजनीतिक फिजा इन दिनों गरमाई हुई है, और चुनावी व प्रशासनिक मुद्दों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। इसी क्रम में केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की वरिष्ठ नेता अन्नपूर्णा देवी ने राज्य की हेमंत सोरेन सरकार और कांग्रेस पार्टी पर बेहद गंभीर और तीखे हमले किए हैं। अन्नपूर्णा देवी ने आरोप लगाया है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार राज्य में कोयले की अवैध चोरी, माफिया राज और बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन को संरक्षण देने के लिए एमएमडीआर (MMDR - Mines and Minerals Development and Regulation) अधिनियम के संशोधनों और नियमों का विरोध कर रही है। केंद्रीय मंत्री के इस बयान के बाद से राज्य के राजनीतिक गलियारों में खलबली मच गई है, क्योंकि खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड में अवैध खनन लंबे समय से एक संवेदनशील और बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है।
MMDR अधिनियम और खनिज संसाधनों के प्रबंधन को लेकर छिड़ा सियासी संग्राम
खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम यानी एमएमडीआर एक्ट केंद्र सरकार द्वारा देश में खनिज संपदा के दोहन, पारदर्शिता और पर्यावरण सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून में समय-समय पर किए गए सुधारों का उद्देश्य अवैध खनन पर लगाम लगाना और खनिज ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाना है। केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी का तर्क है कि झारखंड सरकार जिस प्रकार से इन केंद्रीय नियमों या संशोधनों का विरोध कर रही है, उसके पीछे राज्य के प्रशासनिक सुधार की मंशा नहीं, बल्कि उनके चहेते खनन माफियाओं और सिंडिकेट्स के स्वार्थ छिपे हुए हैं। उनका कहना है कि यदि पारदर्शी नियम सख्ती से लागू हो जाएं, तो अवैध सिंडिकेट्स की दुकानें बंद हो जाएंगी, जो राज्य के वर्तमान शासकों को कतई मंजूर नहीं है।
कोयला चोरी और अवैध खनन से झारखंड को हो रहे आर्थिक नुकसान का मुद्दा
झारखंड को भारत का पावर हाउस कहा जाता है क्योंकि देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा यहाँ की खदानों से निकलने वाले कोयले और खनिजों पर निर्भर है। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी अपार प्राकृतिक संपदा होने के बावजूद राज्य के कई हिस्से और आम लोग कुपोषण और गरीबी से जूझ रहे हैं, जिसका मुख्य कारण बड़े पैमाने पर होने वाली कोयला चोरी और अवैध खनन है। अन्नपूर्णा देवी ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में जेएमएम और कांग्रेस के कार्यकाल के दौरान राज्य में अवैध खनन का कारोबार फूला-फूला है। खुली गाड़ियों और ट्रकों के जरिए रातों-रात कोयले की अवैध तस्करी की जाती है, जिससे न केवल केंद्र और राज्य के खजाने को भारी राजस्व का नुकसान होता है, बल्कि पर्यावरण को भी अपूरणीय क्षति पहुंचती है। प्रशासन की कथित मिलीभगत के बिना इस स्तर पर अवैध धंधा चलना असंभव माना जाता है।
केंद्र सरकार की पारदर्शी नीतियां बनाम राज्य सरकार की राजनीतिक आपत्तियां
भारतीय जनता पार्टी का हमेशा से यह रुख रहा है कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग देश और राज्य के विकास के लिए होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक दल के नेताओं या बिचौलियों की जेब भरने के लिए। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए प्रावधानों का उद्देश्य खदानों के आवंटन में भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त करना है। इसके विपरीत, झारखंड की मौजूदा सरकार इन नियमों को संघीय ढांचे में दखल या अपने अधिकारों का हनन बताकर इसका विरोध करती रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्य सरकार अपने ऊपर उठने वाले इन सवालों से बचने के लिए अक्सर केंद्र पर असहयोग का आरोप मढ़ देती है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि खनिज माफियाओं पर शिकंजा कसने के लिए जितने कड़े प्रशासनिक कदमों की जरूरत है, वे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण उठाए नहीं जा रहे हैं।
आने वाले चुनावों पर इस तीखे राजनीतिक टकराव का पड़ेगा गहरा असर
झारखंड में जैसे-जैसे राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं, भ्रष्टाचार, कोयला चोरी और अवैध खनन जैसे मुद्दे जनता के बीच सबसे बड़े चुनावी हथियार बनते जा रहे हैं। अन्नपूर्णा देवी द्वारा इस आक्रामक अंदाज में राज्य सरकार को घेरना इस बात का संकेत है कि बीजेपी इस मुद्दे को छोड़ने के मूड में बिल्कुल नहीं है। आम जनता भी अब यह भली-भांति समझ रही है कि उनकी धरती के संसाधनों की लूट के पीछे किन लोगों का संरक्षण काम कर रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इन गंभीर आरोपों का क्या जवाब देती है और क्या केंद्रीय नियमों के अनुपालन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कोई कड़ा बदलाव देखने को मिलता है या फिर यह राजनीतिक बयानबाजी यूं ही जारी रहती है।