कल्पना सोरेन ने SIR में सर्टिफिकेट पर उठाए सवाल
झारखंड की राजनीति में आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन और उनकी ऐतिहासिक अस्मिता को लेकर बहस एक बार फिर गरमा गई है। गांडेय विधानसभा क्षेत्र से विधायक और झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की वरिष्ठ नेत्री कल्पना मुर्मू सोरेन ने समरी इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मतदाता सूची सत्यापन की प्रक्रिया के दौरान स्थानीय निवासियों और विशेषकर आदिवासी समुदाय को हो रही प्रशासनिक दिक्कतों पर गहरा रोष व्यक्त किया है। कल्पना सोरेन ने साफ लहजे में कहा कि इस देश में आदिवासियों का इतिहास कागज और दस्तावेजों के आविष्कार से भी सदियों पुराना है। उन्होंने कहा कि अपनी ही जन्मभूमि पर अपने अस्तित्व और नागरिकता को साबित करने के लिए आदिवासियों से पुराने कागजात और सर्टिफिकेट्स मांगना उनके गौरवशाली इतिहास और संवैधानिक अधिकारों का सीधा अपमान है। इस बयान के बाद राज्य के राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ सामाजिक हलकों में भी नागरिकता और चुनावी सत्यापन प्रक्रियाओं को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है।
#1 SIR प्रक्रिया में सर्टिफिकेट और तकनीकी गलतियों पर कल्पना सोरेन का करारा हमला
कल्पना मुर्मू सोरेन ने एक सार्वजनिक मंच से संबोधन के दौरान विशेष पुनरीक्षण और सत्यापन (SIR) प्रक्रिया के दौरान सामने आ रही प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया। उन्होंने कहा कि आज जब प्रशासनिक अधिकारी और बीएलओ (BLO) जमीनी स्तर पर जांच के लिए जाते हैं, तो वे आदिवासियों से उनके पुराने प्रमाण पत्र और कागजात मांगते हैं। तकनीक और स्पेलिंग की छोटी-छोटी गलतियों के कारण लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिए जा रहे हैं। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सिस्टम की तकनीकी कमियों की वजह से रिकॉर्ड में 'मरांडी' को 'मरडी' या अन्य उपनाम लिख दिया जाता है और फिर इसी आधार पर सदियों से रह रहे भूमिपुत्रों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए जाते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि अधिकारियों की इस लापरवाही का खामियाजा गरीब और सीधे-साधे आदिवासी क्यों भुगतें?
#1 'कागज से पुराना इतिहास और ओलचिकी लिपि का सम्मान': आदिवासियों की पहचान पर दोटूक बयान
कल्पना सोरेन ने आदिवासियों की ऐतिहासिक जड़ों और सांस्कृतिक समृद्धता का जिक्र करते हुए कहा कि भारत का संविधान भी संथाली भाषा की 'ओलचिकी' लिपि को पूर्ण मान्यता देता है। जब दुनिया में कागज का आविष्कार भी नहीं हुआ था, तब से आदिवासी समाज इस धरती पर प्रकृति की गोद में बसता आया है और अपने अस्तित्व की रक्षा करता रहा है। इसलिए अपनी ही माटी पर अपने वजूद को साबित करने के लिए आदिवासियों को किसी कागज के टुकड़े या औपनिवेशिक मानसिकता वाले सत्यापन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आदिवासी समुदाय को उनकी पहचान से अलग करने या कागजों के जाल में उलझाने की किसी भी कोशिश को झारखंड की जनता स्वीकार नहीं करेगी।
#1 ब्रिटिश हुकूमत से संघर्ष का दिया हवाला: 'हक-अधिकार के लिए तीर-कमान उठाना जानता है आदिवासी'
अपने भाषण में ऐतिहासिक संदर्भ जोड़ते हुए गांडेय विधायक ने कहा कि आदिवासियों को अपने हक और अधिकार के लिए लड़ना किसी दूसरे से सीखने की जरूरत नहीं है। जब देश में अंग्रेजों का शासन था और ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का दमन चरम पर था, तब बिना किसी आधुनिक हथियार के केवल अपने पारंपरिक 'तीर-कमान' के दम पर आदिवासियों ने ही सबसे पहले उलगुलान और विद्रोह का बिगुल फूंका था। सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव, भगवान बिरसा मुंडा और बाबा तिलका मांझी जैसे महान अमर शहीदों ने अपनी जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए शहादत दी थी। कल्पना सोरेन ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि तीर-कमान आदिवासी समाज के स्वाभिमान, मान और अस्तित्व की पहचान है। सरकार और प्रशासन को ऐसी स्थितियां पैदा नहीं करनी चाहिए कि आदिवासियों को अपने हक के लिए दोबारा वही रास्ता चुनना पड़े।
#1 झारखंड के गठन के त्याग को याद दिलाते हुए एकजुटता की अपील
झारखंड राज्य आंदोलन के लंबे संघर्ष का स्मरण कराते हुए कल्पना सोरेन ने कहा कि यह राज्य किसी को आसानी से या तौहफे में नहीं मिला है। 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन के नेतृत्व में हजारों झारखंडियों ने अपने घर-परिवार त्यागे, लाठियां खाईं और सालों जेलों में बिताए तब जाकर झारखंड राज्य का निर्माण हुआ। आज इस राज्य के संसाधनों, संस्कृति और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना हम सभी की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने समाज में एकता का आह्वान करते हुए कहा कि एक अकेली उंगली कमजोर होती है, लेकिन जब पांचों उंगलियां मिलकर मुक्का बनती हैं तो उसमें अपार ताकत आ जाती है। आदिवासियों को अपनी जमीन और पहचान बचाने के लिए आपसी मतभेदों को भुलाकर एकमुश्त खड़े होना होगा।
#1 प्रशासनिक सुधार और सरलीकरण की उठी मांग
कल्पना सोरेन के इस कड़े रुख के बाद स्थानीय प्रशासन और निर्वाचन विभाग पर सत्यापन प्रक्रियाओं में सुधार लाने का दबाव बढ़ गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और क्षेत्रीय नेताओं का भी कहना है कि दुर्गम और ग्रामीण इलाकों में कागजी दस्तावेजों की जटिलता के कारण वास्तविक नागरिकों को मताधिकार या सरकारी योजनाओं से वंचित करना सरासर अन्याय है। मांग की जा रही है कि SIR और वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन के दौरान बोलचाल की भाषा, स्थानीय परंपराओं और ऐतिहासिक जमीनी रिकॉर्ड्स को प्राथमिकता दी जाए, न कि केवल कागजी विसंगतियों के आधार पर लोगों के अधिकार छीने जाएं।