चुप रहे तो अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा!' IRS निशा उरांव की तीखी चेतावनी

चुप रहे तो अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा!' IRS निशा उरांव की तीखी चेतावनी

झारखंड की भूमि से उठी एक आवाज ने पूरे देश के सामाजिक और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। वरिष्ठ आईआरएस (IRS) अधिकारी और पूर्व पंचायती राज निदेशक निशा उरांव ने अवैध धर्मांतरण के मुद्दे पर सीधा प्रहार करते हुए चेतावनी दी है कि यदि आदिवासी समाज ने अपनी पारंपरिक पहचान और संस्कृति की रक्षा के लिए अब आवाज नहीं उठाई, तो आने वाले समय में उसका मूल अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

निशा उरांव ने स्पष्ट कहा कि भारतीय संविधान और पेसा (PESA) कानून के तहत ग्राम सभा को अपने गांव की सीमा के भीतर किसी भी प्रकार के अनैतिक या अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है।

ग्राम सभा को पेसा अधिनियम (PESA Act) के तहत धर्मांतरण रोकने का पूर्ण अधिकार

आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभाओं की संवैधानिक शक्तियों को रेखांकित करते हुए निशा उरांव ने कहा कि 'पेसा कानून (PESA Act) 1996' की धारा 4(घ) तथा राज्य की पेसा नियमावली की धारा 23 ग्राम सभा को अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने को संरक्षित करने का पूर्ण कानूनी अधिकार देती है।

उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि यदि ग्राम सभाएं अपने गांवों के प्रवेश द्वार पर धर्मांतरण या संदिग्ध धार्मिक गतिविधियों (जैसे अवैध चंगाई सभाओं) पर रोक लगाने वाली सूचना पट्टियां या चेतावनी बोर्ड लगाती हैं, तो यह कदम पूरी तरह से संवैधानिक और कानूनन जायज है। उन्होंने इस बात का भी उल्लेख किया कि सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालय भी ग्राम सभा द्वारा अपनी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था को बचाने के लिए उठाए गए ऐसे कदमों की वैधता को ठहरा चुके हैं।

'वैटिकन-मार्का नैरेटिव' देश की संप्रभुता और सामाजिक ताने-बाने के लिए बड़ा खतरा

निशा उरांव ने उन विदेशी और औपनिवेशिक मानसिकता वाली ताकतों पर तीखा निशाना साधा जो भारत की मिट्टी, यहां की सनातन परंपरा और प्राचीन प्रकृति-पूजक सरना संस्कृति को एक-दूसरे से अलग करके देखती हैं। उन्होंने कहा कि "अपने ही देश में हिंदू और हिंदुत्व को विदेशी या बाहरी बताना वैटिकन-प्रेरित ताकतों का एक बेहद घातक और सुनियोजित नैरेटिव है"।

उनका मानना है कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता की मूल जड़ें हिंदुत्व और प्रकृति पूजा में गहराई से समाई हुई हैं। जो ताकतें समाज में अविश्वास पैदा करके आदिवासियों को उनकी जड़ों से काटने का काम कर रही हैं, वे किसी भी दृष्टिकोण से धर्मनिरपेक्ष (Secular) नहीं हो सकतीं। ऐसी विघटनकारी विचारधाराएं देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए सीधा खतरा पैदा करती हैं।

अवैध धर्मांतरण के जरिए जमीन, रोजगार और आरक्षण छीनने का सुनियोजित षड्यंत्र

निशा उरांव ने इस कड़वे सच का खुलासा करते हुए कहा कि अवैध धर्मांतरण केवल आस्था या पूजा-पद्धति में बदलाव का मामला नहीं रह गया है। इसके पीछे एक बहुत बड़ा राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक नियंत्रण का एजेंडा छिपा हुआ है। धर्मांतरण के माध्यम से आदिवासियों की 'भुईहरी' और 'पहनाई' जैसी पुश्तैनी जमीनों, उनके आरक्षित रोजगारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक आरक्षण के लाभों पर कब्जा जमाने की योजनाबद्ध कोशिशें की जा रही हैं।

उन्होंने कहा कि जब कोई आदिवासी अपना मूल धर्म छोड़कर दूसरे धर्म (बपतिस्मा) में चला जाता है, तो उसकी सांस्कृतिक धारा पूरी तरह बदल जाती है। ऐसे लोग जो अपनी मूल परंपराओं, पूजा पद्धतियों (जैसे महादेव, धर्मेश और सिंगबोंगा की आराधना) और पूर्वजों के रीति-रिवाजों को त्याग चुके हैं, उन्हें ग्राम प्रधान, पाहन, महतो या पड़हा राजा जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण पारंपरिक आदिवासी पदों पर आसीन रहने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए।

'चंगाई सभाओं' का सच और चमत्कार के नाम पर फैले अंधविश्वास पर नकेल कसना जरूरी

ग्राम सभाओं द्वारा विभिन्न इलाकों में पादरियों या बाहरी प्रचारकों के प्रवेश पर लगाई जा रही पाबंदियों का समर्थन करते हुए निशा उरांव ने स्पष्ट किया कि यह किसी सामान्य नागरिक की आवाजाही पर रोक नहीं है, बल्कि अंधविश्वास और धोखे से कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक है।

उन्होंने 'चंगाई सभाओं' के नाम पर चलाए जा रहे तथाकथित चमत्कारी इलाज के अभियानों पर सवाल उठाते हुए कहा कि इन सभाओं में सरना आस्था और देवी-देवताओं का अपमान किया जाता है, जिससे गांवों की शांति भंग होती है। ग्राम सभाओं को यह अधिकार है कि वे ऐसे अंधविश्वास, चमत्कारिक दावों और प्रलोभनों पर अपने गांव में रोक लगाएं।

पूर्वजों की 'लिविंग हेरिटेज' को बचाने के लिए एकजुटता और 'धर्म-संरक्षण' की जरूरत

अपने विस्तृत संदेश में निशा उरांव ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने पेसा कानून की रचना इसलिए की थी ताकि आदिवासियों की सदियों पुरानी जीवनशैली और प्रथाओं को 'लिविंग हेरिटेज' (जीवंत विरासत) के रूप में बचाया जा सके। दुनिया की कई प्राचीन संस्कृतियां आज सिर्फ संग्रहालयों के शोकेस में बंद हो चुकी हैं, लेकिन भारतीय आदिवासियों की संस्कृति आज भी उनके जीवन में प्रत्यक्ष रूप से बह रही है।

उन्होंने समाज के सभी बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और धर्म-संरक्षण में विश्वास रखने वाले नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी तरह के डर या प्रभाव में आए बिना अपने संवैधानिक अधिकारों को पहचानें। यदि ग्राम सभाएं अपनी पारंपरिक व्यवस्था को बचाने के लिए सशक्त होकर निर्णय नहीं लेंगी, तो आने वाली पीढ़ियां अपनी पहचान और अधिकार दोनों खो बैठेंगी।