झारखंड में प्रकृति और परंपरा का महापर्व करम पूजा की धूम: रांची में मांदर की थाप पर झूमे लोग

झारखंड में प्रकृति और परंपरा का महापर्व करम पूजा की धूम: रांची में मांदर की थाप पर झूमे लोग

झारखंड की हरी-भरी वादियों, आदिवासी संस्कृति और लोक परंपराओं के आंचल में जब भी किसी बड़े पर्व की गूंज सुनाई देती है, तो पूरा राज्य उल्लास और उमंग के रंगों में सराबोर हो जाता है। प्रकृति के प्रति अटूट प्रेम, भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और अच्छी फसल की कामना का प्रतीक माना जाने वाला महापर्व 'करम पूजा' (Karma Puja) इस समय पूरे झारखंड समेत राजधानी रांची में पूरी भव्यता के साथ मनाया जा रहा है। रांची शहर से लेकर ग्रामीण इलाकों तक चारों तरफ ढोल, नगाड़ों और पारंपरिक मांदर (Mandar) की थाप गूंज रही है, जिस पर आदिवासी समाज के युवा, बुजुर्ग और महिलाएं झूमते हुए नजर आ रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ के बीच अपनी संस्कृति और जड़ों से जुड़े रहने का यह अनूठा नजारा हर किसी का मन मोह रहा है। आइए विस्तार से जानते हैं कि करम पूजा क्या है, इसका झारखंड की संस्कृति से क्या नाता है और रांची में इस पर्व को लेकर किस प्रकार का उत्साह देखने को मिल रहा है।

करम पूजा मुख्य रूप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला एक बेहद पवित्र और प्राचीन पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से प्रकृति की पूजा और कर्म के महत्व को समर्पित है। इस उत्सव के दौरान करम (कदम्ब) पेड़ की डाली की विशेष पूजा की जाती है, जिसे प्रकृति की जीवंत ऊर्जा और देवता का प्रतीक माना जाता है। लोक कथाओं के अनुसार, करम और धरम नाम के दो भाइयों की पौराणिक कथा से जुड़ा यह त्योहार मनुष्य के जीवन में कर्म की प्रधानता को रेखांकित करता है। आदिवासी समाज का मानना है कि प्रकृति ही हमारी सच्ची जननी है, जो हमें अन्न, जल, वायु और जीवन के सभी संसाधन प्रदान करती है, इसलिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए करम पर्व का आयोजन किया जाता है।

झारखंड की राजधानी रांची में करम पूजा के पावन अवसर पर एक अलग ही रौनक और उत्सव का माहौल देखने को मिल रहा है। शहर के विभिन्न चौक-चौराहों, आदिवासी बहुल इलाकों और करम स्थलों पर आकर्षक सजावट की गई है। ढोल, ढाक, और पारंपरिक मांदर की थाप पर जब आदिवासी युवक और युवतियां पारंपरिक नृत्य (झूमर) प्रस्तुत करते हैं, तो पूरा वातावरण संगीतमय हो जाता है। पारंपरिक परिधानों में सजे-धजे लोग करम डाली को नदी या तालाब से विधि-विधान के साथ अपने अखाड़े और पूजा स्थल तक लाते हैं। रांची के स्थानीय पार्कों और सार्वजनिक मैदानों में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में समाज के लोग पूरी तन्मयता के साथ हिस्सा लेते हैं, जो राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर देता है।

प्रकृति की आराधना के साथ-साथ करम पूजा भाई और बहन के बीच के पवित्र प्रेम और स्नेह का भी सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। इस व्रत को मुख्य रूप से बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उनके जीवन से सभी संकटों को दूर करने के लिए रखती हैं। पूजा के दौरान बहनें उपवास रखती हैं और करम की डाली के समक्ष कथा सुनती हैं। इस अवसर पर भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं और उनके रक्षा का वचन निभाते हैं। यह त्योहार पारिवारिक बंधनों को और अधिक मजबूत करने के साथ-साथ समाज में आपसी भाईचारे और सौहार्द का संदेश देता है, जो आज की व्यस्त जीवनशैली में इंसानों को अपनों के करीब लाने का काम करता है।

आज के इस तेज रफ्तार और तकनीकी युग में जहां युवा अपनी प्राचीन संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहीं झारखंड का करम पर्व यह साबित करता है कि आधुनिकता के साथ अपनी जड़ों को सहेजना कितना जरूरी है। राज्य सरकार और विभिन्न सांस्कृतिक संगठनों द्वारा इस पर्व को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी लोक कला, संगीत और परंपराओं पर गर्व महसूस कर सके। करम पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के उस जीवन दर्शन का परिचायक है जो पर्यावरण संरक्षण और संतुलन की सीख देता है। रांची और पूरे झारखंड में गूंजती मांदर की यह थाप आने वाले समय में भी प्रकृति के प्रति प्रेम की अमर कहानी कहती रहेगी।