पीओपी और थर्मोकूल की मूर्तियों पर पूरी तरह प्रतिबंध, विसर्जन के लिए भी कड़े निर्देश जारी

पीओपी और थर्मोकूल की मूर्तियों पर पूरी तरह प्रतिबंध, विसर्जन के लिए भी कड़े निर्देश जारी

भारत भर में आस्था, उत्साह और उल्लास के साथ मनाए जाने वाले सबसे बड़े और पवित्र त्योहारों में से एक 'दुर्गा पूजा' का पावन पर्व जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे देश के अलग-अलग राज्यों में प्रशासनिक तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। इसी कड़ी में झारखंड राज्य सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस बार के उत्सव को पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल और सुरक्षित बनाने के लिए कुछ बेहद कड़े और नए नियम लागू किए हैं। हर साल भव्य पंडालों और आकर्षक मूर्तियों के साथ मनाए जाने वाले इस त्योहार में पिछले कुछ समय से जल स्रोतों और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर चिंता जताई जा रही थी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने इस बार पारंपरिक आस्था और प्रकृति के संरक्षण के बीच एक संतुलन बिठाने के लिए सख्त कदम उठाने का फैसला किया है, ताकि आस्था का यह महापर्व पर्यावरण को किसी भी प्रकार की हानि न पहुंचाए।

पीओपी और थर्मोकूल की मूर्तियों पर पूर्ण प्रतिबंध

झारखंड प्रशासन द्वारा जारी किए गए नए और सख्त दिशा-निर्देशों के तहत इस बार राज्य में प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और थर्मोकूल से बनी हुई दुर्गा एवं अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियों के निर्माण, बिक्री और उनके उपयोग पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। जिला प्रशासन का यह स्पष्ट आदेश है कि पंडालों में स्थापित की जाने वाली सभी मूर्तियां केवल प्राकृतिक रूप से शुद्ध चिकनी मिट्टी (Eco-friendly Clay), प्राकृतिक रंगों और पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाने वाली सामग्रियों से ही बनाई जानी चाहिए। प्लास्टर ऑफ पेरिस और सिंथेटिक रंगों से बनी मूर्तियां जब पूजा के बाद जल स्रोतों में विसर्जित की जाती हैं, तो वे पानी में गलती नहीं हैं और पानी को भारी मात्रा में जहरीला बना देती हैं, जिससे जलीय जीवों और इंसानों के स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। सरकार के इस कदम का मुख्य उद्देश्य राज्य की नदियों, तालाबों और जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त रखना और पर्यावरण को बचाना है।

मूर्ति विसर्जन को लेकर जिला प्रशासन के कड़े और सख्त नियम

मूर्तियों के निर्माण से लेकर उनके विसर्जन तक की पूरी प्रक्रिया को लेकर इस बार प्रशासन ने बेहद कड़े और अनुशासनबद्ध नियम तय किए हैं। पूजा समितियों और आयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे पारंपरिक जल स्रोतों, पवित्र नदियों या बड़े तालाबों के मुख्य हिस्सों में सीधे तौर पर मूर्तियों का विसर्जन नहीं कर सकेंगे। इसके विकल्प के रूप में जिला प्रशासन द्वारा जलाशयों के किनारे कृत्रिम विसर्जन कुंड (Artificial Immersion Ponds) का निर्माण कराया जा रहा है, ताकि पानी का प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रह सके। विसर्जन के दौरान हुड़दंग, अत्यधिक शोरगुल और प्रतिबंधित प्लास्टिक या थर्मोकूल के उपयोग पर पूरी तरह से पाबंदी रहेगी। पुलिस और स्थानीय प्रशासन की टीमें हर एक पूजा पंडाल और विसर्जन स्थल पर अपनी पैनी नजर रखेंगी, और यदि कोई भी समिति नियमों का उल्लंघन करती पाई जाती है, तो उनके खिलाफ कानून के तहत सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

पूजा समितियों और आम जनता से प्रशासन की अपील

त्योहारों के इस उल्लासपूर्ण माहौल में प्रशासन के इन नए और कड़े नियमों को लेकर राज्य भर की तमाम पूजा समितियों और आम नागरिकों की तरफ से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। हालांकि, अधिकांश जागरूक समितियों और पर्यावरण प्रेमियों ने सरकार के इस फैसले का तहे दिल से स्वागत किया है और कहा है कि पर्यावरण की रक्षा करना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है। प्रशासन लगातार सोशल मीडिया, विज्ञापनों और जन-जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों से यह अपील कर रहा है कि वे इस बार की दुर्गा पूजा को पूरी तरह से 'ग्रीन दुर्गा पूजा' के रूप में मनाएं। इको-फ्रेंडली मूर्तियों का उपयोग करें, पंडालों में प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचें और नियमों का पालन करके प्रशासन का पूरा सहयोग करें। जब आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं, तभी समाज और प्रकृति दोनों का वास्तविक और स्थायी विकास संभव हो पाता है।