छात्र आंदोलन के बाद एक्शन में सीएम हेमंत, नए खनिज कानून और बकाए पर छेड़ी जंग
झारखंड में प्रशासनिक मोर्चे पर एक के बाद एक बड़े घटनाक्रम सामने आ रहे हैं। राज्य में चल रहे छात्र आंदोलनों और प्रतियोगिता परीक्षाओं से जुड़े गतिरोध को संवाद के जरिए सुलझाने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अब सीधे तौर पर राज्य के आर्थिक और वित्तीय अधिकारों पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया है। युवाओं के भविष्य और परीक्षा संबंधी मांगों को शांत करने के तुरंत बाद सीएम हेमंत सोरेन ने राज्य के सबसे बड़े आर्थिक आधार यानी खनिज संपत्ति और नए माइनिंग कानून को लेकर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। उन्होंने तीखे तेवर अपनाते हुए सीधा सवाल उठाया है कि आखिर इन बदलावों से राज्य को होने वाले भारी नुकसान की भरपाई कौन करेगा? इस एक बड़े बयान के साथ मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सरकार झारखंड के खनिज संसाधनों और बकाए राजस्व को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।
छात्र आंदोलन का शांतिपूर्ण समाधान और प्रशासनिक स्थिरता
झारखंड में पिछले कुछ हफ्तों से परीक्षाओं, पेपर लीक और नियुक्ति प्रक्रियाओं को लेकर छात्रों का जबरदस्त आक्रोश देखने को मिल रहा था। छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शन और राजधानी रांची से लेकर विभिन्न जिलों तक चले इस लंबे संघर्ष के बीच सरकार ने संवेदनशीलता दिखाते हुए संवाद का रास्ता अपनाया। प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर कई मुद्दों के हल होने और छात्रों की चिंताओं को दूर करने के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता की बहाली हुई है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इस स्थिति को संभालते हुए तुरंत बाद राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले खनन क्षेत्र की समीक्षा शुरू कर दी है। सरकार का मानना है कि छात्र शक्ति और युवाओं का भविष्य झारखंड की प्राथमिकता है, लेकिन साथ ही राज्य की वित्तीय सेहत को सुरक्षित रखना भी उतना ही अनिवार्य है।
'नुकसान की भरपाई कौन करेगा?': हेमंत सोरेन के सवालों ने बढ़ाई राजनीतिक सरगर्मी
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने नए खान एवं खनिज संशोधन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा है कि केंद्र सरकार द्वारा जो बदलाव लाए जा रहे हैं, उनसे झारखंड के राजस्व को जो भारी नुकसान होगा, उसकी भरपाई कौन करेगा? मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र ने राज्यों को भरोसे में लिए बिना और उनकी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए जल्दबाजी में यह विधेयक पारित कराया है। उनका आरोप है कि इस प्रकार के फैसलों से झारखंड जैसे आदिवासी और खनिज बहुल राज्यों के वित्तीय अधिकार सीमित हो जाएंगे, जिसका सीधा असर यहाँ के गरीबों, दलितों, पिछड़ों और मजदूरों के कल्याण पर पड़ेगा। इसके अलावा, झारखंड पहले से ही कोयला कंपनियों और केंद्रीय उपक्रमों के पास अपने 1.36 लाख करोड़ रुपये के बकाया रॉयल्टी और जमीन मुआवजे की मांग कर रहा है, जिसे लेकर राज्य सरकार लगातार मुखर है।
झारखंड के खनिज अधिकारों पर नया संकट और विरोध का ऐलान
झारखंड देश के सबसे अमीर खनिज राज्यों में शुमार है, जहां कोयला, लौह अयस्क, और अन्य मूल्यवान खनिज प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ऐसे में नए माइनिंग कानूनों के जरिए राज्य के अधिकारों में कटौती किए जाने को लेकर झामुमो (JMM) और राज्य सरकार ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि इस कानून के विरोध में लोकतांत्रिक, संवैधानिक और कानूनी हर स्तर पर कड़ा संघर्ष किया जाएगा। राज्य सरकार का यह भी तर्क है कि इस तरह के संशोधनों से राज्य की प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं जैसे कि मंईयां सम्मान योजना, अबुआ आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य बजट पर भी विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
आने वाले दिनों में क्या होगी झारखंड सरकार की रणनीति?
छात्र आंदोलन के मोर्चे को सफलतापूर्वक संभालने के बाद अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का पूरा ध्यान केंद्र के साथ आर्थिक और खनिज अधिकारों की इस कानूनी और राजनीतिक लड़ाई पर है। झारखंड के अधिकारों की रक्षा के लिए क्षेत्रीय दलों और जनसरोकार से जुड़े मुद्दों पर सरकार जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि केंद्र और राज्य के बीच खनिज रॉयल्टी और नए संशोधनों को लेकर चल रहा यह गतिरोध किस दिशा में आगे बढ़ता है, क्योंकि झारखंड अपने वित्तीय हितों और संसाधनों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह सख्त नजर आ रहा है।