Jharkhand Politics : घाटशिला में JMM-BJP का खेल बिगाड़ेंगे जयराम महतो? टाइगर की एंट्री से दोनों खेमों में बेचैनी
News India Live, Digital Desk : झारखंड की राजनीति में हमेशा से सीधी टक्कर JMM (झारखंड मुक्ति मोर्चा) और BJP (भारतीय जनता पार्टी) के बीच मानी जाती रही है। लेकिन घाटशिला विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले एक 'नया खिलाड़ी' मैदान में ऐसा उतरा है, जिसने दोनों ही प्रमुख दलों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं। यह नया खिलाड़ी कोई और नहीं, बल्कि झारखंड की सियासत के 'नए टाइगर', जयराम महतो (Jairam Mahto) और उनकी पार्टी JLKM (झारखंडी भाषा खतियान संघर्ष समिति) है।
घाटशिला का चुनावी रण सज चुका था और JMM व BJP अपने-अपने वोट बैंक को लेकर लगभग निश्चिंत थे। लेकिन जयराम महतो की एंट्री ने इस सीधे मुकाबले को एक बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित 'त्रिकोणीय' संघर्ष में बदल दिया है।
JMM-BJP की टेंशन क्यों बढ़ी?
जयराम महतो की ताकत उनका अनोखा अंदाज और उनके उठाए गए मुद्दे हैं, जो सीधे तौर पर यहां के स्थानीय लोगों, खासकर युवाओं से जुड़ते हैं।
- खतियानी और स्थानीयता का मुद्दा: जयराम महतो की पूरी राजनीति '1932 के खतियान' और 'बाहरी-भीतरी' के मुद्दे पर टिकी है। घाटशिला एक ऐसा क्षेत्र है जहां स्थानीय पहचान और हक का मुद्दा हमेशा से हावी रहा है। जयराम का यह नारा यहां के मूलवासी और आदिवासी वोटरों के एक बड़े हिस्से को अपनी ओर खींच सकता है।
- JMM के वोट बैंक में सेंध: घाटशिला पारंपरिक रूप से JMM का गढ़ माना जाता रहा है। पार्टी का मुख्य वोट बैंक आदिवासी और मूलवासी ही हैं। जयराम महतो भी इसी वोट बैंक को साध रहे हैं। ऐसे में डर यह है कि जयराम महतो, JMM के वोटों में बड़ी सेंधमारी कर सकते हैं, जिससे पार्टी का जीत का गणित बिगड़ जाएगा।
- BJP के लिए भी कम नहीं है खतरा: दूसरी ओर, BJP को कुर्मी-महतो समुदाय का अच्छा-खासा वोट मिलता रहा है। जयराम महतो खुद इसी समुदाय से आते हैं और युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता आसमान पर है। अगर महतो समुदाय का वोट जयराम की ओर खिसकता है, तो यह BJP के लिए भी बड़ा झटका होगा।
सिर्फ वोटकटवा नहीं, 'गेम चेंजर' बन सकते हैं जयराम
राजनीतिक विश्लेषक जयराम महतो को अब सिर्फ एक 'वोटकटवा' नेता मानने की भूल नहीं कर रहे हैं। जिस तरह से उनकी रैलियों में भीड़ उमड़ रही है और युवा उनके 'खतियानी' नारे के साथ जुड़ रहे हैं, उससे यह साफ है कि वह दोनों प्रमुख दलों को बराबर की चोट पहुंचा सकते हैं।
JMM और BJP के नेता भले ही खुलकर कुछ न बोल रहे हों, लेकिन अंदरखाने दोनों ही खेमों में बेचैनी का माहौल है। दोनों ही दल अब अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर हो गए हैं। उन्हें पता है कि अगर जयराम महतो ने 15-20 हजार वोट भी काट लिए, तो जीत और हार का पूरा समीकरण ही पलट जाएगा।
अब घाटशिला का यह उपचुनाव सिर्फ दो पार्टियों के बीच की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह झारखंड की राजनीति में एक नए युग की दस्तक का संकेत भी दे रहा है, जहां एक युवा नेता अपने दम पर स्थापित दलों का 'खेल' बिगाड़ने की ताकत रखता है।