Jharkhand Municipal Act : सिर्फ 50 हज़ार आबादी, फिर भी नगर निगम क्यों? झारखंड के कई शहरों के नियम पर मंडरा रहा खतरा

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News India Live, Digital Desk: अक्सर हम अपने आस-पास की सफाई, पानी, सड़क, और बाकि व्यवस्थाओं को लेकर नगर निगमों (Nagar Nigam / Municipal Corporation) को कोसते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके शहर को 'नगर निगम' क्यों कहा जाता है, और किसी दूसरे को क्यों नहीं?

झारखंड हाईकोर्ट ने अब इसी मुद्दे को लेकर एक बड़ा और अहम सवाल उठाया है। कोर्ट ने झारखंड सरकार से पूछा है कि क्या राज्य में नगर निगमों का वर्गीकरण (Classification of Municipal Corporations in Jharkhand) सही तरीके से किया गया है, या फिर यह सीधे तौर पर संवैधानिक नियमों के खिलाफ (Against Constitutional Rules) है? 

क्या है यह 'पूरा मामला' और क्यों उठा सवाल?

दरअसल, झारखंड म्युनिसिपल एक्ट (Jharkhand Municipal Act) के मुताबिक किसी भी इलाके को नगर निगम बनाने के लिए एक तयशुदा मानक (Standard Criteria) होना चाहिए, जैसे- वहां की जनसंख्या (Population), कमाई (Revenue) और आबादी का घनत्व (Density of Population) वगैरह।

मगर, जो बात कोर्ट को परेशान कर रही है, वह यह है कि कुछ ऐसे शहर भी हैं, जिन्हें झारखंड सरकार ने नगर निगम (Jharkhand Government Municipal Corporation) बना दिया है, जबकि उनकी आबादी 50,000 या 5 लाख जैसे मानकों को पूरा नहीं करती। मान लीजिए, कुछ जगह की आबादी बहुत कम है, फिर भी वह नगर निगम है! याचिकाकर्ताओं (Petitioners) ने यही सवाल उठाया है— कि नगर निकायों (Municipal Bodies) का यह मनमाना वर्गीकरण बिलकुल अनुचित (Unjustified) है।

हाईकोर्ट ने सरकार से क्या पूछा है?

इस याचिका की सुनवाई करते हुए झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of Jharkhand High Court) की बेंच ने सरकार को साफ़-साफ़ निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आप झारखंड नगर निगमों की वर्तमान स्थिति और उन्हें वर्गीकृत (Classified) करने की पूरी प्रक्रिया की संवैधानिक वैधता (Constitutional Validity) की पूरी रिपोर्ट पेश करें। सीधे शब्दों में कहें तो, नगर निगम की घोषणा करते वक्त आपने किन क़ानूनी नियमों का पालन किया है, ये हमें बताएं!

यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है, क्योंकि शहरों के वर्गीकरण से सिर्फ नाम ही नहीं बदलता, बल्कि इससे उस शहर में टैक्स, सुविधाओं और विकास की योजनाओं (Development Schemes) का पूरा गणित बदल जाता है। अब सारी निगाहें झारखंड सरकार पर टिकी हैं कि वह कोर्ट में क्या जवाब देती है। यह फैसला राज्य के कई छोटे-बड़े नगर निगमों के भविष्य की दिशा तय कर सकता है। 

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